
चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक नई सैन्य रणनीति सामने आई है, जिसने वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन अपनी पुरानी और आउटडेटेड J-6 लड़ाकू विमानों को अटैक ड्रोन में बदल रहा है और इन्हें ताइवान के आसपास के इलाकों, खासकर समुद्री क्षेत्रों में तैनात कर रहा है। J-6 विमान, जो कभी चीन की वायुसेना की रीढ़ हुआ करते थे, अब आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार बिना पायलट के उड़ने वाले ड्रोन के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति “लो-कॉस्ट, हाई-इम्पैक्ट” युद्ध का हिस्सा है, जिसमें कम लागत वाले ड्रोन का इस्तेमाल कर दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर किया जा सकता है। ताइवान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की अटकलों के बीच यह कदम और भी अहम माना जा रहा है। चीन लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा बताता आया है और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाया गया है।
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, पुराने J-6 को ड्रोन में बदलने से चीन को दोहरा फायदा मिलता है—एक तरफ वह अपने पुराने सैन्य संसाधनों का उपयोग कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह जोखिम भी कम कर रहा है, क्योंकि इन ड्रोन में पायलट की जान का खतरा नहीं होता। इसके अलावा, बड़ी संख्या में इन ड्रोन को तैनात कर चीन ताइवान की वायु रक्षा प्रणाली को भ्रमित और थका सकता है। हाल ही में खाड़ी क्षेत्र और ताइवान स्ट्रेट के पास इनकी गतिविधियों में वृद्धि देखी गई है, जो इस बात का संकेत हो सकता है कि चीन भविष्य में किसी बड़े सैन्य ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है। हालांकि, अभी तक चीन ने आधिकारिक रूप से किसी हमले की पुष्टि नहीं की है, लेकिन उसकी बढ़ती सैन्य गतिविधियां और नई तकनीकी रणनीतियां क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा रही हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि ताइवान मुद्दा केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक भू-राजनीति से जुड़ा हुआ है।



