UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की राह, वीटो पावर के पुराने ऑफर और 3 बड़ी चुनौतियां

भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता की मांग लंबे समय से वैश्विक कूटनीति का अहम मुद्दा बनी हुई है। समय-समय पर यह दावा किया जाता रहा है कि अमेरिका और सोवियत संघ ने अतीत में भारत को वीटो पावर वाले पद की पेशकश की थी, लेकिन उस समय की परिस्थितियों और कूटनीतिक फैसलों के कारण यह मामला आगे नहीं बढ़ सका।
आज भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों, वैश्विक विकास तथा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बावजूद UNSC की स्थायी सदस्यता हासिल करने की राह आसान नहीं है।
भारत के सामने पहली बड़ी चुनौती सुरक्षा परिषद के मौजूदा ढांचे में बदलाव की है। UNSC के स्थायी सदस्य देशों में सुधार को लेकर व्यापक सहमति बनाना कठिन रहा है, क्योंकि मौजूदा शक्तियां अपने विशेष अधिकारों को बनाए रखना चाहती हैं।
दूसरी चुनौती वीटो पावर का मुद्दा है। कई देश सुरक्षा परिषद के विस्तार का समर्थन करते हैं, लेकिन नए स्थायी सदस्यों को वीटो अधिकार देने पर मतभेद बने हुए हैं। यही कारण है कि सुधार प्रक्रिया वर्षों से धीमी गति से आगे बढ़ रही है।
तीसरी बड़ी चुनौती वैश्विक राजनीतिक समीकरण हैं। चीन समेत कुछ देशों के रुख और क्षेत्रीय कूटनीतिक संतुलन का असर भारत की स्थायी सदस्यता की कोशिशों पर पड़ता है। हालांकि, भारत लगातार जी-4 समूह और अन्य मंचों के माध्यम से UNSC सुधार की मांग को आगे बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की आर्थिक ताकत, बड़ी आबादी और वैश्विक भूमिका उसे मजबूत दावेदार बनाती है, लेकिन स्थायी सदस्यता के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बदलाव और व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति जरूरी होगी।



