
वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की अगुआई वाले ब्रिक्स समूह ने एक नया इतिहास रच दिया है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स देशों की सामूहिक अर्थव्यवस्था ने पारंपरिक रूप से मजबूत माने जाने वाले जी-7 देशों को पीछे छोड़ दिया है। यह परिवर्तन न केवल विश्व राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक आर्थिक समीकरणों में भी एक बड़ा बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है।
ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) लंबे समय से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। हाल के वर्षों में, भारत ने जिस गति से विकास किया है और निवेश को आकर्षित किया है, उसने इस संगठन को और मज़बूती दी है। इसके विपरीत, जी-7 देशों की अर्थव्यवस्था में मंदी और विकास की धीमी गति देखने को मिली है। यही वजह है कि ब्रिक्स अब एक विकल्प के रूप में विश्वभर में अपनी स्थिति को मजबूत कर रहा है।
इस बीच, अमेरिका के एक दिग्गज अर्थशास्त्री ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ब्रिक्स की बढ़ती ताकत को गंभीरता से नहीं लेता, तो आने वाले वर्षों में डॉलर की वैश्विक प्रभुत्व की स्थिति डगमगा सकती है। उन्होंने कहा कि भारत और चीन जैसे देश वैश्विक व्यापार में नई नीतियां बना रहे हैं और ऊर्जा से लेकर तकनीक तक कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। इससे पश्चिमी देशों की पकड़ कमजोर होती जा रही है।
भारत की भूमिका इस पूरे बदलाव में बेहद अहम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने न केवल निवेश और बुनियादी ढांचे में तेज़ी से काम किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छवि को मजबूत किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में ब्रिक्स न केवल आर्थिक मोर्चे पर, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर भी जी-7 के सामने एक सशक्त चुनौती बनकर खड़ा होगा।
यानी साफ है कि वैश्विक आर्थिक ताकत का संतुलन अब पश्चिम से हटकर एशिया और विकासशील देशों की ओर तेजी से शिफ्ट हो रहा है, और इसमें भारत अग्रणी भूमिका निभा रहा है।



