
भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के तहत एक बड़ा और महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। देश ने वर्ष 2035 तक करीब 400 करोड़ टन अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार करने की दिशा में काम करने की घोषणा की है। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की जिम्मेदार भूमिका को भी दर्शाता है।
कार्बन सिंक का मतलब उन प्राकृतिक या कृत्रिम माध्यमों से है, जो वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर लेते हैं। इसमें प्रमुख रूप से जंगल, पेड़-पौधे, मिट्टी और समुद्री क्षेत्र शामिल होते हैं। भारत सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर वनीकरण, पुनर्वनीकरण और हरित क्षेत्र के विस्तार पर जोर दे रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को लाखों हेक्टेयर भूमि पर नए पेड़ लगाने होंगे और मौजूदा वनों की गुणवत्ता को भी सुधारना होगा। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में भी हरित पहल जैसे ग्रीन कॉरिडोर, पार्क और रूफटॉप गार्डनिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सके।
यह लक्ष्य भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत देश 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करना चाहता है। सरकार नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से निवेश कर रही है। इससे न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, बल्कि आर्थिक विकास और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
हालांकि, इस लक्ष्य को पूरा करना आसान नहीं होगा। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय, निजी क्षेत्र की भागीदारी और आम जनता की जागरूकता बेहद जरूरी है। पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन बनाकर ही इस दिशा में ठोस सफलता हासिल की जा सकती है।
कुल मिलाकर, 2035 तक 400 करोड़ टन कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य भारत की जलवायु प्रतिबद्धता को मजबूत करता है और यह दिखाता है कि देश विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के लिए गंभीर प्रयास कर रहा है।



