
इजराइल और मुस्लिम देशों के बीच रिश्ते दशकों से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। बीते 30 वर्षों में इजराइल को तीन मुस्लिम देशों से आधिकारिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी, जिनमें जॉर्डन, तुर्किये और हाल ही में कतर शामिल हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यकाल में ये घटनाएं इजराइल की विदेश नीति और कूटनीतिक दबाव की झलक दिखाती हैं।
सबसे पहले 1997 में जॉर्डन के साथ यह स्थिति बनी, जब इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद के एजेंटों ने हमास नेता खालिद मशाल की हत्या की कोशिश की। इस कार्रवाई से जॉर्डन बुरी तरह नाराज़ हुआ और उसने इजराइल को मजबूर किया कि वह न सिर्फ माफी मांगे बल्कि मशाल को बचाने के लिए एंटीडोट उपलब्ध कराए। इसके साथ ही, जॉर्डन की कड़ी प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि इजराइल को अपनी सीमा से बाहर की कार्रवाइयों के गंभीर नतीजे भुगतने होंगे।
इसके बाद 2010 में तुर्किये और इजराइल के रिश्तों में बड़ा तनाव आया। गाज़ा के लिए भेजे गए मानवीय सहायता जहाज “मावी मरमारा” पर इजराइली कमांडो ने हमला कर दिया था, जिसमें 10 तुर्की नागरिक मारे गए। इस घटना के बाद तुर्किये ने इजराइल से कड़ा विरोध दर्ज कराया और लंबे समय तक दोनों देशों के रिश्ते ठंडे रहे। अंततः 2016 में नेतन्याहू ने आधिकारिक माफी के साथ मुआवजा भी देने पर सहमति जताई। यह इजराइल के लिए कूटनीतिक झटका था, क्योंकि उसे पहली बार किसी मुस्लिम देश को आर्थिक मुआवजा देना पड़ा।
अब 2025 में कतर के साथ इजराइल की माफी की खबर ने फिर से सुर्खियां बटोरी हैं। कतर, जो हमास सहित कई फिलिस्तीनी समूहों का समर्थन करता है, लंबे समय से इजराइल की नीतियों का विरोध करता रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव और मध्य पूर्व में बदलते समीकरणों के कारण नेतन्याहू को झुकना पड़ा। कतर के साथ बातचीत में इजराइल ने आधिकारिक तौर पर खेद जताया, जिससे यह साबित होता है कि क्षेत्रीय राजनीति में समझौते और संतुलन बनाना अब आवश्यक हो चुका है।
इन तीन घटनाओं से साफ है कि भले ही इजराइल सैन्य शक्ति और तकनीकी रूप से मजबूत है, लेकिन मुस्लिम देशों के साथ रिश्तों में उसे बार-बार माफी और समझौते करने पड़े हैं। नेतन्याहू की कूटनीति ने कई मौकों पर इजराइल को संकट से निकाला, लेकिन इन माफियों ने यह भी दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अकेले कठोर रुख से काम नहीं चलता, बल्कि समय-समय पर लचीलापन और स्वीकार्यता भी जरूरी है।



