
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने नवीनतम वैज्ञानिक सैटेलाइट ‘अन्वेषा’ को निर्धारित मिशन के तहत सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित तो कर दिया, लेकिन मिशन के दौरान रॉकेट की PS3 स्टेज में आई तकनीकी खराबी के कारण उपग्रह को उसकी तय कक्षा में पूरी तरह स्थापित नहीं किया जा सका। यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया था, जहां से रॉकेट ने सामान्य रूप से उड़ान भरी और शुरुआती दो चरणों तक सब कुछ योजना के अनुसार चलता रहा। हालांकि तीसरे चरण यानी PS3 स्टेज के सक्रिय होते ही उसमें दबाव और थ्रस्ट से जुड़ी समस्या सामने आई, जिससे रॉकेट को आवश्यक वेग नहीं मिल सका। इसी वजह से ‘अन्वेषा’ सैटेलाइट अपनी निर्धारित ऑर्बिट से थोड़ा नीचे रह गया।
ISRO ने आधिकारिक बयान में कहा कि सैटेलाइट सुरक्षित है और उससे संपर्क भी बना हुआ है, लेकिन वह फिलहाल अपेक्षित कक्षा में नहीं पहुंच पाया है। वैज्ञानिक अब उपग्रह के ऑनबोर्ड सिस्टम और प्रोपल्शन मॉड्यूल की मदद से उसकी कक्षा को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है तो ‘अन्वेषा’ अपने वैज्ञानिक उद्देश्यों को काफी हद तक पूरा कर सकता है। यह सैटेलाइट पृथ्वी अवलोकन, वायुमंडलीय अध्ययन और अंतरिक्ष मौसम से जुड़ी जानकारियां जुटाने के लिए डिजाइन किया गया है, जो जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और मौसम पूर्वानुमान के क्षेत्र में भारत को अहम डेटा उपलब्ध कराएगा।
इस मिशन में आई तकनीकी दिक्कत को ISRO ने गंभीरता से लिया है और इसकी विस्तृत जांच के आदेश दे दिए गए हैं। विशेषज्ञों की एक टीम यह पता लगाएगी कि PS3 स्टेज में आखिर कौन-सी तकनीकी खामी आई और भविष्य में ऐसी समस्या से कैसे बचा जा सकता है। हालांकि ISRO का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा है और पहले भी ऐसी चुनौतियों के बावजूद संगठन ने कई बार सफल वापसी की है। ‘अन्वेषा’ मिशन में आई इस रुकावट को एक सीख के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भविष्य के प्रक्षेपण और भी अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बनाए जा सकें। अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को देखते हुए ISRO का यह प्रयास देश की वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भरता को एक बार फिर दर्शाता है।
