
लोकसभा में सांसदों की उपस्थिति को लेकर एक बड़ा और अहम बदलाव किया गया है। अब संसद की कार्यवाही के दौरान सांसदों की अटेंडेंस सिर्फ तभी मानी जाएगी जब वे अपनी निर्धारित सीट पर बैठकर सदन में मौजूद होंगे। यदि कोई सांसद लोकसभा के हॉल, लॉबी या अन्य किसी हिस्से में मौजूद है, लेकिन अपनी सीट पर नहीं बैठा है, तो उसकी उपस्थिति दर्ज नहीं होगी और उसे अनुपस्थित माना जाएगा। इस नए नियम का उद्देश्य संसद की कार्यवाही को अधिक अनुशासित, गंभीर और प्रभावी बनाना है।
अब तक यह देखा गया था कि कई सांसद सदन परिसर में तो मौजूद रहते थे, लेकिन महत्वपूर्ण चर्चा या प्रश्नकाल के दौरान अपनी सीट पर नहीं बैठते थे। इससे न केवल उपस्थिति का वास्तविक आंकड़ा प्रभावित होता था, बल्कि बहस और निर्णय प्रक्रिया पर भी असर पड़ता था। नए नियम के तहत सांसदों को सदन के भीतर सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया जाएगा, ताकि जनता के मुद्दों पर गंभीर चर्चा सुनिश्चित हो सके।
लोकसभा सचिवालय की ओर से यह व्यवस्था तकनीकी रूप से भी मजबूत की जा रही है। अटेंडेंस सिस्टम को सांसदों की सीटों से जोड़ा गया है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कौन सांसद वास्तव में सदन में बैठकर कार्यवाही में हिस्सा ले रहा है। इससे फर्जी या औपचारिक उपस्थिति की संभावना खत्म होगी और संसद की कार्यकुशलता बढ़ेगी।
इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ सांसदों का कहना है कि यह नियम अनुशासन लाने के लिए जरूरी है, वहीं कुछ का मानना है कि कई बार संसदीय कार्यों के कारण लॉबी या हॉल में मौजूद रहना भी जरूरी होता है। हालांकि, नियम बनाने वालों का तर्क है कि सदन की गरिमा बनाए रखने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने के लिए यह कदम आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस नए नियम से संसद की कार्यवाही अधिक पारदर्शी होगी और सांसदों की जवाबदेही बढ़ेगी। जनता भी यह जान सकेगी कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि वास्तव में कितनी गंभीरता से सदन में उपस्थित रहते हैं। कुल मिलाकर, लोकसभा में अटेंडेंस का यह नया नियम भारतीय संसदीय लोकतंत्र को और अधिक मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।



