
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर नियंत्रण को लेकर ‘स्वतंत्र नियामक’ बनाने की सिफारिश की है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिना किसी नियम और दिशा-निर्देश के फैलती गलत सूचना और कंटेंट की समस्या गंभीर होती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, ओटीटी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर छह बड़े खतरे सबसे अधिक देखने को मिलते हैं। पहला खतरा है भ्रामक और फर्जी खबरें, जो समाज में अफवाह फैलाने और मानसिक तनाव बढ़ाने का कारण बनती हैं। दूसरा खतरा है हिंसक और आपत्तिजनक कंटेंट, जो युवाओं और बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। तीसरा बड़ा खतरा है डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन, क्योंकि यूजर्स का व्यक्तिगत डेटा कई बार उनकी अनुमति के बिना इस्तेमाल किया जाता है। चौथा खतरा है मनिपुलेशन और मानसिक दबाव, जहां सोशल मीडिया एल्गोरिदम का उपयोग करके यूजर्स की राय और चुनावी प्रवृत्तियों को प्रभावित किया जा सकता है। पांचवां खतरा है साइबर बुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न, जो मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालता है। और छठा खतरा है असमान कंटेंट मॉडरेशन, जिसमें प्लेटफॉर्म्स का नीति में भेदभाव और पक्षपात दिखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सभी खतरों से निपटने के लिए एक स्वतंत्र और पारदर्शी नियामक संस्था बनाना आवश्यक है। यह नियामक प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट, विज्ञापन, डेटा और उपयोगकर्ता शिकायतों की समीक्षा करेगा और उनके संचालन में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यह कदम न केवल डिजिटल इंडस्ट्री के लिए संतुलन बनाएगा, बल्कि आम जनता की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगा। विशेषज्ञ यह भी जोड़ते हैं कि स्वतंत्र नियामक का होना मीडिया और ओटीटी कंपनियों की जिम्मेदारी को बढ़ाएगा और उन्हें जिम्मेदार कंटेंट बनाने के लिए प्रेरित करेगा। डिजिटल दुनिया में तेजी से बदलाव और नई तकनीकों के आने के साथ यह कदम समय की मांग है, ताकि समाज में फैली गलत जानकारी, हिंसक कंटेंट और डेटा दुरुपयोग जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सके।



