
ईरान एक बार फिर गहरे राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, जहां महंगाई, बेरोजगारी, महिलाओं के अधिकार और धार्मिक पाबंदियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग सीधे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को चुनौती दे रहे हैं। इसी बीच ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे और निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने खुलकर मौजूदा इस्लामिक शासन के खिलाफ हुंकार भर दी है। उन्होंने कहा है कि ईरानी जनता अब डर के साये से बाहर निकल चुकी है और देश एक ऐतिहासिक परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है। रजा पहलवी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह ईरान के लोगों के लोकतांत्रिक संघर्ष का समर्थन करे और खामेनेई सरकार को मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए जवाबदेह ठहराया जाए। उनके इस बयान को ऐसे समय में बेहद अहम माना जा रहा है, जब तेहरान से लेकर शिराज और मशहद तक लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और सुरक्षा बलों की सख्ती के बावजूद जनता पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही। रजा पहलवी ने यह भी संकेत दिया कि यदि परिस्थितियां अनुकूल होती हैं तो वे ईरान लौटकर एक संक्रमणकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण में भूमिका निभाने को तैयार हैं, हालांकि उन्होंने साफ किया कि उनका लक्ष्य सत्ता हासिल करना नहीं बल्कि ईरान में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का रास्ता खोलना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहलवी परिवार का नाम आज भी ईरान के एक वर्ग में स्थिरता और आधुनिकता की याद दिलाता है, वहीं दूसरा वर्ग शाह के दौर को तानाशाही से जोड़कर देखता है, इसलिए रजा पहलवी की वापसी आसान नहीं होगी। इसके बावजूद मौजूदा हालात में उनकी सक्रियता विपक्षी ताकतों को एक प्रतीकात्मक नेतृत्व दे सकती है, जो बिखरे हुए आंदोलनों को एक मंच पर लाने में मददगार साबित हो। खामेनेई के नेतृत्व वाला इस्लामिक गणराज्य पहले ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, आर्थिक संकट और अंदरूनी असंतोष से जूझ रहा है, ऐसे में रजा पहलवी की चुनौती राजनीतिक दबाव को और बढ़ा सकती है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ईरान का यह जनआक्रोश किसी बड़े सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ता है या फिर सरकार इसे बलपूर्वक दबाने में कामयाब रहती है, लेकिन इतना तय है कि रजा पहलवी की आवाज ने ईरान के भविष्य की बहस को एक नई दिशा दे दी है।



