
वेनेजुएला में लंबे समय से राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकट बना हुआ है, लेकिन इन तमाम चुनौतियों के बावजूद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सत्ता पर पकड़ अब भी मजबूत नजर आती है। अंतरराष्ट्रीय दबाव, अमेरिकी प्रतिबंध, विपक्ष के आंदोलन और आर्थिक गिरावट के बीच मादुरो सरकार का टिके रहना इस बात का संकेत है कि सत्ता की कमान केवल एक व्यक्ति के हाथ में नहीं, बल्कि भरोसेमंद लोगों के मजबूत नेटवर्क के सहारे संचालित हो रही है।
निकोलस मादुरो ने अपने शासनकाल में सेना, खुफिया एजेंसियों और सरकारी संस्थानों में अपने करीबी और वफादार अधिकारियों को अहम पदों पर नियुक्त किया है। वेनेजुएला की सेना मादुरो शासन की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। सैन्य नेतृत्व को न सिर्फ राजनीतिक संरक्षण मिला है, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक फैसलों में भी उनकी भूमिका बढ़ी है। यही कारण है कि विपक्ष के कई आंदोलनों के बावजूद सेना ने मादुरो का साथ नहीं छोड़ा।
इसके अलावा, देश की आंतरिक सुरक्षा और खुफिया तंत्र भी मादुरो के भरोसेमंद लोगों के नियंत्रण में है। विरोध प्रदर्शनों पर कड़ी निगरानी, विपक्षी नेताओं की गतिविधियों पर नजर और सरकारी तंत्र में असहमति को दबाने में इन एजेंसियों की अहम भूमिका रही है। इससे सत्ता को चुनौती देने वाली आवाजें कमजोर पड़ी हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी मादुरो ने सत्तारूढ़ यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी ऑफ वेनेजुएला (PSUV) के भीतर अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी है। पार्टी के शीर्ष पदों पर उन्हीं नेताओं को जगह दी गई है जो मादुरो के प्रति पूरी तरह वफादार माने जाते हैं। इससे पार्टी के भीतर किसी बड़े विद्रोह की संभावना कम हो गई है।
आर्थिक मोर्चे पर भले ही वेनेजुएला संकट में हो, लेकिन तेल संसाधनों पर सरकार का नियंत्रण अब भी सत्ता का बड़ा आधार है। सरकारी तेल कंपनी PDVSA में भी मादुरो समर्थकों की मजबूत पकड़ है, जिससे सीमित संसाधनों के बावजूद सरकार खुद को चलाने में सफल रही है।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि निकोलस मादुरो की सत्ता केवल उनकी व्यक्तिगत ताकत का परिणाम नहीं है, बल्कि भरोसेमंद सैन्य, राजनीतिक और प्रशासनिक सहयोगियों के मजबूत घेरे का नतीजा है। यही नेटवर्क वेनेजुएला की सत्ता को अब तक संभाले हुए है, भले ही देश गंभीर संकट से गुजर रहा हो।


