हर कोई खुद को शंकराचार्य नहीं लिख सकता’, अविमुक्तेश्वरानंद मामले में बोले सीएम योगी

Yogi Adityanath ने अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद पर पहली बार खुलकर प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि सनातन परंपराओं में पद और उपाधियों का अपना अनुशासन होता है, और कोई भी व्यक्ति स्वयं को मनमाने ढंग से शंकराचार्य नहीं लिख सकता। मुख्यमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब संत समाज के भीतर इस विषय को लेकर चर्चा तेज है और अलग-अलग पक्ष अपनी दलीलें दे रहे हैं। योगी ने कहा कि आदि शंकर की परंपरा अत्यंत प्राचीन, व्यवस्थित और मर्यादित है, जिसे मानने वालों की भावनाएं भी इससे जुड़ी हैं, इसलिए किसी भी तरह की घोषणा या दावा परंपरागत व्यवस्था के अनुरूप ही होना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक पदों की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने संकेत दिया कि परंपरा से जुड़े मामलों में मान्य पीठों, अखाड़ों और संतों की सहमति अहम मानी जाती है। इस तरह के विषयों पर अनावश्यक भ्रम या प्रतिस्पर्धा से श्रद्धालुओं के बीच गलत संदेश जा सकता है। योगी का कहना था कि भारत की आध्यात्मिक विरासत हजारों वर्षों में विकसित हुई है और उसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर रखा जाना चाहिए।
Swami Avimukteshwaranand को लेकर चल रही बहस पर मुख्यमंत्री ने किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी करने से बचते हुए सिद्धांत की बात रखी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का दायित्व कानून-व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना है, लेकिन धार्मिक संस्थाओं के अंदरूनी विषयों का समाधान परंपरागत तंत्र के माध्यम से ही बेहतर ढंग से निकलता है। संत समाज को आपसी संवाद से रास्ता निकालना चाहिए।
राजनीतिक हलकों में मुख्यमंत्री के इस बयान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे सरकार का रुख स्पष्ट हुआ है कि वह धार्मिक उपाधियों के उपयोग को लेकर स्थापित परंपराओं के पक्ष में है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह चर्चा और तेज हो सकती है, लेकिन योगी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि आस्था के विषय में अनुशासन और मर्यादा सर्वोपरि हैं।



