
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में बड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि संघ में नेतृत्व का आधार जाति नहीं बल्कि व्यक्ति की निष्ठा, समर्पण और कार्यक्षमता है। उन्होंने कहा कि यह धारणा पूरी तरह गलत है कि सरसंघचालक केवल किसी एक विशेष जाति से ही हो सकता है। संघ की परंपरा और कार्यपद्धति समाज को जोड़ने, भेदभाव मिटाने और समरसता बढ़ाने पर आधारित है। भागवत ने जोर देकर कहा कि संघ स्वयं को पूरे हिंदू समाज का संगठन मानता है, इसलिए यहां हर वर्ग और हर समुदाय के स्वयंसेवक को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।
अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि संघ की शाखाओं में किसी की पहचान उसकी जाति से नहीं बल्कि स्वयंसेवक के रूप में होती है। साथ बैठना, साथ खेलना, साथ भोजन करना और साथ मिलकर समाज के लिए काम करना—यही संघ का संस्कार है। उन्होंने कहा कि वर्षों से संघ ने सामाजिक समरसता के लिए अनेक पहल की हैं और कई स्थानों पर अलग-अलग समुदायों के लोग जिम्मेदार पदों पर काम कर रहे हैं। सरसंघचालक का चयन भी लंबे अनुभव, संगठनात्मक समझ और कार्यकर्ताओं के विश्वास के आधार पर होता है।
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि भारत का समाज विविधताओं से भरा हुआ है, लेकिन इन विविधताओं को विभाजन का कारण नहीं बल्कि शक्ति के रूप में देखना चाहिए। संघ का प्रयास हमेशा रहा है कि समाज में ऊंच-नीच की भावना खत्म हो और सभी को समान सम्मान मिले। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति संघ के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है, राष्ट्रहित में काम करता है और संगठन को आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है, तो उसके लिए कोई भी पद दूर नहीं है।
उनके इस बयान को सामाजिक समरसता और संगठन के भीतर समान अवसर के संदेश के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से चल रही उन चर्चाओं पर भी इससे विराम लगाने की कोशिश मानी जा रही है, जिनमें नेतृत्व को लेकर तरह-तरह के अनुमान लगाए जाते रहे हैं। भागवत का कहना था कि संघ व्यक्ति निर्माण का काम करता है, और जब व्यक्ति में योग्यताएं विकसित होती हैं तो जिम्मेदारियां स्वतः मिलती हैं। इस तरह उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में आगे बढ़ने का रास्ता सबके लिए खुला है और जाति के आधार पर किसी प्रकार का बंधन नहीं है।



