
चीन में कुख्यात ‘एक बच्चा नीति’ को समाप्त हुए पूरे 10 साल हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद देश की जन्म दर में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो सकी है। वर्ष 2015 में चीन सरकार ने जनसंख्या संतुलन को सुधारने के उद्देश्य से इस नीति को खत्म कर दो बच्चों और बाद में तीन बच्चों की अनुमति दी, मगर सामाजिक और आर्थिक हकीकत ने सरकार की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। आज स्थिति यह है कि चीन तेजी से घटती जनसंख्या और बूढ़े होते समाज की चुनौती से जूझ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक चली एक बच्चा नीति ने चीनी समाज की सोच को ही बदल दिया है। युवा दंपती अब ज्यादा बच्चे पैदा करने को बोझ मानते हैं। महंगी शिक्षा, बढ़ती स्वास्थ्य सेवाओं की लागत, आवास संकट और करियर पर पड़ने वाला असर लोगों को परिवार बढ़ाने से रोक रहा है। खासकर शहरी इलाकों में युवा महिलाएं शादी और मातृत्व को टाल रही हैं, जिससे जन्म दर और नीचे जा रही है।
सरकार ने हाल के वर्षों में बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए टैक्स में छूट, सब्सिडी, मैटरनिटी लीव और आवास सुविधाओं जैसे कई कदम उठाए हैं, लेकिन इनका असर सीमित ही रहा है। आंकड़े बताते हैं कि चीन की कुल प्रजनन दर अब भी प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे है। इससे भविष्य में श्रम शक्ति की कमी, आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होने और पेंशन व स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ने का खतरा बढ़ गया है।
चीन को अब सबसे ज्यादा डर तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी का सता रहा है। कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या घटने से देश की औद्योगिक और आर्थिक ताकत कमजोर हो सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नीतियां बदलना काफी नहीं है, बल्कि परिवार और काम के बीच संतुलन, महिलाओं को बेहतर समर्थन और जीवन की लागत कम करने जैसे गहरे सामाजिक सुधारों की जरूरत है। अन्यथा, ‘एक बच्चा नीति’ खत्म होने के दशक बाद भी चीन जनसंख्या संकट से बाहर नहीं निकल पाएगा।



