
कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने विदेश नीति को लेकर एक बड़ा और अहम बयान दिया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। थरूर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी प्रधानमंत्री की हार को भारत की हार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि विदेश नीति किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल की बपौती नहीं होती। यह देश के दीर्घकालिक हितों, संस्थागत निरंतरता और राष्ट्रीय सहमति से संचालित होती है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारत की विदेश नीति को लेकर घरेलू राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं।
शशि थरूर ने कहा कि भारत की विदेश नीति दशकों की मेहनत, अनुभव और वैश्विक समझ का परिणाम है। इसमें सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन मूल सिद्धांत—रणनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय हितों की रक्षा और वैश्विक मंच पर सम्मान—लगभग समान रहते हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन इसे देश विरोधी करार देना या भारत की छवि से जोड़ना गलत है।
थरूर के मुताबिक, विदेश नीति पर स्वस्थ बहस होनी चाहिए, क्योंकि इससे नीतियों में सुधार और मजबूती आती है। उन्होंने यह भी कहा कि जब भारत किसी वैश्विक मंच पर चुनौती का सामना करता है, तो विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की जिम्मेदारी होती है कि वे देशहित को प्राथमिकता दें। विदेश नीति को चुनावी राजनीति का हथियार बनाना न तो परिपक्व लोकतंत्र की निशानी है और न ही भारत जैसे जिम्मेदार राष्ट्र के अनुरूप।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि भारत की कूटनीतिक परंपरा—गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर आज की बहुपक्षीय कूटनीति तक—लगातार विकसित होती रही है। इसमें अलग-अलग सरकारों का योगदान रहा है। इसलिए किसी एक सरकार की सफलता या असफलता को पूरे देश से जोड़कर देखना उचित नहीं है। थरूर ने यह भी रेखांकित किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत को उसकी संस्थाओं, मूल्यों और दीर्घकालिक दृष्टि के आधार पर आंकता है, न कि किसी एक नेता के आधार पर।
कुल मिलाकर, शशि थरूर का यह बयान विदेश नीति को लेकर एक संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होने चाहिए। प्रधानमंत्री की हार या जीत राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, पर भारत की वैश्विक स्थिति और प्रतिष्ठा उससे कहीं अधिक व्यापक और मजबूत आधार पर टिकी होती है।



