
गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में महिला विधायकों की संख्या अपेक्षाकृत कम होने को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। शिवसेना के एक नेता ने इन राज्यों के आंकड़े सामने रखते हुए बीजेपी सरकारों पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि जहां एक ओर महिला सशक्तिकरण की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित है। गुजरात में 15, मध्य प्रदेश में 27 और उत्तर प्रदेश में 47 महिला विधायक होना इस असंतुलन को दर्शाता है, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं।
इसके अलावा, सामाजिक और पारिवारिक बाधाएं भी महिलाओं के राजनीति में आने के रास्ते में चुनौती बनती हैं। कई बार संसाधनों की कमी, चुनावी खर्च और समर्थन तंत्र की अनुपस्थिति भी महिलाओं को पीछे कर देती है। ऐसे में केवल नीतियों की घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव की जरूरत है ताकि महिलाओं को राजनीति में समान अवसर मिल सके।
इस मुद्दे पर विपक्षी दल लगातार सरकार को घेर रहे हैं और महिला आरक्षण जैसे बड़े कदमों को जल्द लागू करने की मांग कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या राजनीतिक दल इस दिशा में गंभीर प्रयास करते हैं या यह मुद्दा सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित रह जाता है।



