
आयोवा यूनिवर्सिटी में कथित रैगिंग का एक परेशान कर देने वाला वीडियो सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया पर हड़कंप मचा दिया है। वीडियो में करीब 56 युवकों को आंखों पर पट्टी बांधकर और शर्टलेस अवस्था में खड़ा देखा जा सकता है। दावा किया जा रहा है कि ये सभी छात्र किसी फ्रेटरनिटी या छात्र समूह से जुड़े थे और उनके साथ तथाकथित ‘इनिशिएशन रिचुअल’ के नाम पर यह व्यवहार किया गया। वीडियो में छात्रों को लाइन में खड़ा कर चिल्लाने, अपमानजनक निर्देश देने और मानसिक दबाव बनाने जैसी गतिविधियां नजर आती हैं। इस घटना ने कैंपस संस्कृति, रैगिंग और छात्र सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।
हालांकि University of Iowa की ओर से आधिकारिक बयान में कहा गया है कि मामले की जांच शुरू कर दी गई है और यदि किसी भी तरह के नियमों का उल्लंघन पाया गया तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की जबरन गतिविधि, शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती हैं, बल्कि संस्थान की छवि को भी नुकसान पहुंचाती हैं।
अमेरिका में फ्रेटरनिटी कल्चर लंबे समय से विवादों में रहा है। कई बार ‘रैगिंग’ को परंपरा या भाईचारे की भावना से जोड़कर पेश किया जाता है, लेकिन जब यह अपमान, डर और जबरदस्ती की सीमा पार कर जाए तो यह गंभीर अपराध बन जाता है। इस ताजा वीडियो ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कॉलेज कैंपसों में निगरानी तंत्र पर्याप्त है? क्या नए छात्रों को सुरक्षित माहौल मिल पा रहा है?
सोशल मीडिया पर लोगों ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। कई पूर्व छात्रों ने भी अपनी आपबीती साझा करते हुए कहा कि इस तरह की प्रथाएं वर्षों से चली आ रही हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि इन्हें पूरी तरह खत्म किया जाए। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या भय का माहौल बनाना युवाओं में लंबे समय तक तनाव, आत्मविश्वास की कमी और अवसाद जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।
फिलहाल जांच जारी है और यह स्पष्ट नहीं है कि वीडियो हाल का है या पुराना। लेकिन इतना तय है कि इस घटना ने छात्र संगठनों की कार्यप्रणाली और विश्वविद्यालयों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो संबंधित छात्रों और संगठनों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि किसी भी परंपरा या समूह भावना के नाम पर मानव गरिमा से खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं हो सकता।



