टीचर्स डे स्पेशल: डॉ. रीना की ‘संस्कृत प्रयोगशाला’ | 9 मीटर लंबी बाल पोथी से जीवंत हुआ वेद-पुराण व उपनिषद ज्ञान

शिक्षक दिवस विशेष अवसर पर डॉ. रीना का योगदान शिक्षा जगत में एक प्रेरणादायी उदाहरण के रूप में सामने आता है। उन्होंने संस्कृत भाषा को जीवंत और रोचक बनाने के लिए एक अनोखी पहल की है, जिसे उन्होंने नाम दिया है – ‘संस्कृत की प्रयोगशाला’। इस प्रयोगशाला में छात्र केवल किताबों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे संस्कृत भाषा के प्रयोगात्मक और व्यावहारिक स्वरूप को भी समझते हैं। डॉ. रीना का मानना है कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की आत्मा है, जिसे बच्चों तक सरल और रचनात्मक तरीके से पहुँचाना ज़रूरी है।
डॉ. रीना की सबसे बड़ी उपलब्धि है 9 मीटर लंबी ‘बाल पोथी’ का निर्माण। यह पोथी केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि ज्ञान का भंडार है, जिसमें वेदों, पुराणों और उपनिषदों की परिभाषाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इस विशेष पोथी का उद्देश्य है कि बच्चों और युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ा जाए और उन्हें संस्कृत के महत्व से अवगत कराया जाए।
बाल पोथी के पन्ने इस तरह से तैयार किए गए हैं कि पाठक को दृश्यात्मक और बौद्धिक आनंद दोनों प्राप्त हो। इसमें रंगीन चित्रों के साथ संस्कृत के श्लोक और उनके अर्थ दिए गए हैं। छात्र इसे पढ़ते समय न केवल भाषा सीखते हैं बल्कि जीवन मूल्यों, नैतिक सिद्धांतों और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को भी आत्मसात करते हैं। इस प्रकार यह पोथी शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे जीवन जीने की कला से भी जोड़ती है।
‘संस्कृत की प्रयोगशाला’ में बच्चों को शब्दों के उच्चारण, व्याकरण की बारीकियों और श्लोकों के भावार्थ को समझाने के लिए नई-नई गतिविधियाँ कराई जाती हैं। कहीं पर समूह में मंत्रोच्चार कराया जाता है तो कहीं पर संस्कृत नाटकों और गीतों के माध्यम से भाषा को सिखाया जाता है। इस नवाचार ने बच्चों में संस्कृत के प्रति रुचि और उत्साह को बढ़ाया है।
डॉ. रीना की यह पहल शिक्षा जगत में एक नया आयाम प्रस्तुत करती है। शिक्षक दिवस जैसे अवसर पर उनका यह कार्य हमें यह संदेश देता है कि एक सच्चा शिक्षक केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह नई राहें दिखाता है और समाज को दिशा देता है। संस्कृत प्रयोगशाला और 9 मीटर लंबी बाल पोथी उनके इस दृष्टिकोण का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
इस प्रकार, डॉ. रीना का प्रयास यह दर्शाता है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम यदि सही ढंग से किया जाए तो शिक्षा को और अधिक प्रभावी तथा रोचक बनाया जा सकता है। उनकी यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है और संस्कृत भाषा के पुनर्जागरण का मजबूत आधार भी।



