
साल 2026 भारत की विदेश नीति के लिए विशेष रूप से अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसी वर्ष भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी’ एक बड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरती नजर आ रही है। यह नीति भारत के निकटवर्ती पड़ोसी देशों—नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, अफगानिस्तान और पाकिस्तान—के साथ मैत्रीपूर्ण, सहयोगात्मक और स्थिर संबंधों को प्राथमिकता देती है। बदलते वैश्विक परिदृश्य, क्षेत्रीय अस्थिरता और चीन के बढ़ते प्रभाव ने भारत के लिए पड़ोस में संतुलन साधना और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है। एक ओर बांग्लादेश और भूटान जैसे देशों के साथ भारत के संबंध अपेक्षाकृत मजबूत हैं, वहीं दूसरी ओर श्रीलंका की आर्थिक अस्थिरता, मालदीव में राजनीतिक बदलाव और नेपाल के साथ समय-समय पर उभरते मतभेद भारत की कूटनीति की परीक्षा ले रहे हैं। पाकिस्तान के साथ संबंध अब भी तनावपूर्ण हैं, जिससे क्षेत्रीय शांति और व्यापारिक सहयोग प्रभावित होता है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और मानवीय सहयोग के माध्यम से भी पड़ोसियों का विश्वास जीते। इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं, ऊर्जा सहयोग, आपदा प्रबंधन में मदद और लोगों से लोगों के संपर्क (People-to-People Contact) भारत की रणनीति के अहम स्तंभ बन सकते हैं। साथ ही, चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के मुकाबले भारत को पारदर्शी, टिकाऊ और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास मॉडल पेश करना होगा। 2026 में यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी’ को केवल नारे तक सीमित रखता है या फिर उसे व्यवहारिक रूप से लागू कर क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका निभाता है। संतुलित कूटनीति, संवेदनशील संवाद और साझा हितों पर आधारित सहयोग ही भारत को अपने पड़ोस में स्थायी विश्वास और स्थिरता दिला सकता है, जो अंततः उसके राष्ट्रीय हितों और वैश्विक भूमिका को भी मजबूत करेगा।

