
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां हमेशा से वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय रही हैं। एक बार फिर उन्होंने व्यापारिक मोर्चे पर टैरिफ (आयात शुल्क) का बम फोड़ने की तैयारी दिखाई है। हालांकि इस बार भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यह टैरिफ बम ज्यादा असरदार नहीं होगा। दरअसल, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी कूटनीतिक नीति को नया आयाम दिया है। ‘डिप्लोमेसी रीसेट’ के तहत भारत अब न केवल अमेरिका, बल्कि यूरोप, एशिया और विशेष रूप से चीन के साथ रिश्तों को नए सिरे से संतुलित करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। इसी कड़ी में चीनी विदेश मंत्री का दिल्ली दौरा बेहद अहम माना जा रहा है।
भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य आज “मल्टी-एलाइन्मेंट” पर आधारित है। यानी, भारत किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय सभी महाशक्तियों के साथ संतुलित संबंध रख रहा है। ट्रंप के संभावित टैरिफ कदम से भारत की अर्थव्यवस्था पर अल्पकालिक दबाव जरूर पड़ सकता है, लेकिन पिछले वर्षों में भारत ने वैकल्पिक बाज़ारों और उत्पादन श्रृंखलाओं पर जो ध्यान दिया है, वह इस दबाव को काफी हद तक कम कर देगा। यही कारण है कि भारतीय नीति-निर्माता इसे “फुस्स टैरिफ बम” कह रहे हैं।
चीनी विदेश मंत्री का भारत दौरा इस पूरे परिदृश्य को और भी रोचक बना रहा है। भारत और चीन के बीच भले ही सीमाई तनाव रहे हों, लेकिन व्यापारिक संबंधों को पूरी तरह तोड़ा नहीं जा सकता। चीन अभी भी भारत के लिए बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों देश आपसी संवाद के जरिए आर्थिक और कूटनीतिक संतुलन कायम करने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली में होने वाली मुलाकातों में सीमा विवाद, निवेश के अवसर, और एशिया में शक्ति संतुलन जैसे मुद्दों पर चर्चा की संभावना है।
भारत की यह रणनीति दुनिया को यह संदेश देती है कि अब भारत किसी दबाव में झुकने वाला देश नहीं रहा। चाहे अमेरिका हो, चीन हो या यूरोप, भारत अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से नीतियां बना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “मेक इन इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत” और “ग्लोबल साउथ” की नेतृत्वकारी भूमिका इस नई कूटनीति की रीढ़ हैं। ट्रंप के टैरिफ फैसले का असर भारत पर सीमित रहेगा क्योंकि अब भारत न केवल अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है बल्कि नए-नए निर्यात बाजार भी खोज रहा है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह दौर भारत के लिए अवसरों से भरा हुआ है। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया जा रहा है, तो दूसरी ओर चीन और रूस जैसे देशों के साथ संवाद के रास्ते खुले रखे जा रहे हैं। यह “संतुलित विदेश नीति” भारत को वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है। आने वाले समय में जब चीनी विदेश मंत्री दिल्ली में भारतीय नेताओं से बातचीत करेंगे, तो निश्चित रूप से यह मुलाकात एशिया ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए अहम संकेत लेकर आएगी।
संक्षेप में कहा जाए तो ट्रंप का टैरिफ बम भारत को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाएगा। भारत ने अपनी डिप्लोमेसी को नए सिरे से रीसेट करके यह साबित कर दिया है कि अब वह वैश्विक राजनीति का सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक किरदार बन चुका है।



