
भारतीय राजनीति में उपराष्ट्रपति चुनाव हमेशा से सत्ता और विपक्ष की रणनीतिक दिशा को तय करने वाला एक अहम पड़ाव रहा है। वर्ष 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तमिलनाडु के वरिष्ठ नेता और राज्यपाल रहे सी.पी. राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। यह कदम न केवल बीजेपी की संगठनात्मक रणनीति को दर्शाता है, बल्कि विपक्षी खेमे में सेंध लगाने की उसकी तैयारी को भी साफ करता है।
दरअसल, बीजेपी जानती है कि उपराष्ट्रपति चुनाव में सीधा बहुमत भले ही एनडीए के पक्ष में हो, लेकिन दक्षिण भारत में उसकी पकड़ उतनी मजबूत नहीं है जितनी उत्तर भारत और पश्चिम भारत में है। ऐसे में राधाकृष्णन जैसे दक्षिण भारत से आने वाले वरिष्ठ नेता को उम्मीदवार बनाना विपक्षी दलों, खासकर डीएमके और कांग्रेस जैसे दलों के समीकरणों को चुनौती देने जैसा है। राधाकृष्णन की छवि एक सुलझे हुए, ईमानदार और अनुभवी नेता की रही है। वे तमिलनाडु में बीजेपी के लिए लंबे समय से संगठनात्मक स्तर पर काम करते रहे हैं और राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी स्वीकार्यता रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी ने यह फैसला सिर्फ एक चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसके जरिए वह 2027 के आम चुनावों से पहले दक्षिण भारत में अपनी जड़ें मजबूत करना चाहती है। उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर किसी दक्षिण भारतीय चेहरे को लाने से बीजेपी वहां के मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती है कि वह क्षेत्रीय संतुलन और विविधता का सम्मान करती है। इसके अलावा यह दांव विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक में भी दरार डाल सकता है, क्योंकि कुछ क्षेत्रीय दल राधाकृष्णन जैसे सर्वमान्य चेहरे के खिलाफ खुलकर वोट करने से हिचक सकते हैं।
बीजेपी की इस रणनीति से साफ है कि पार्टी केवल वर्तमान राजनीतिक समीकरणों पर नहीं, बल्कि भविष्य की राह पर नजर रखे हुए है। उपराष्ट्रपति चुनाव भले ही एक संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन इसका सीधा असर विपक्षी खेमे की एकजुटता और भाजपा की राजनीतिक साख पर पड़ता है। यही वजह है कि विपक्ष इस बार बेहद सतर्क है और भाजपा के इस कदम को उसकी “रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक” के रूप में देख रहा है।
कुल मिलाकर, सी.पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना भाजपा की दक्षिण भारत में पैठ बढ़ाने और विपक्षी गठबंधन में दरार डालने की सुनियोजित कोशिश है। अब देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस रणनीति का तोड़ निकालने में कितना सफल होता है और आगामी चुनावी समीकरण किस ओर करवट लेते हैं।



