
भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका चुनावी तंत्र है, जहाँ हर पद पर निष्पक्ष मुकाबला देखने को मिलता है। इसी कड़ी में अब देश के उपराष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर सियासत गरमा गई है। 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग/एनडीए) और विपक्षी गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला तय माना जा रहा है। यह चुनाव न सिर्फ संख्या बल की परीक्षा होगा बल्कि आने वाले समय में देश की राजनीतिक दिशा को भी तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
राजग की ओर से जिस उम्मीदवार का नाम सामने आ रहा है, उन्हें एनडीए के घटक दलों का पूरा समर्थन मिलने की संभावना है। बीजेपी, जेडीयू, शिरोमणि अकाली दल, लोक जनशक्ति पार्टी समेत कई सहयोगी दल राजग के उम्मीदवार को एकजुटता से समर्थन दे रहे हैं। वहीं विपक्ष भी एकजुट होकर अपना उम्मीदवार मैदान में उतार चुका है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, डीएमके और वामपंथी दलों ने विपक्षी उम्मीदवार के पक्ष में अपनी रणनीति साफ कर दी है।
संख्याबल की बात करें तो राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदनों के सांसद उपराष्ट्रपति के चुनाव में मतदान करते हैं। ऐसे में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों का पलड़ा फिलहाल भारी दिखाई दे रहा है। लेकिन विपक्ष भी यह दिखाना चाहता है कि वह मजबूत विकल्प है और जनहित के मुद्दों पर एकजुट होकर सत्ता पक्ष को चुनौती देने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि उपराष्ट्रपति चुनाव केवल पद की लड़ाई नहीं बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच ताकत आज़माने का बड़ा मंच बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव विपक्ष के लिए अपनी एकजुटता साबित करने का मौका है, वहीं राजग के लिए यह अपनी राजनीतिक पकड़ और संसदीय संख्या बल का प्रदर्शन करने का अवसर है। अगर राजग का उम्मीदवार जीतता है तो यह सरकार की ताकत और विपक्ष की कमजोरी का संकेत होगा। दूसरी ओर यदि विपक्ष मज़बूत टक्कर देता है, तो यह आने वाले आम चुनावों से पहले विपक्षी दलों को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
कुल मिलाकर, उपराष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर है। दोनों पक्ष अपनी रणनीति और समीकरण साधने में जुटे हुए हैं। देश की जनता भी उत्सुक है कि आखिर इस बार उपराष्ट्रपति की कुर्सी पर कौन आसीन होगा—राजग का उम्मीदवार या विपक्ष का दावेदार।



