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ट्रंप की ईरान रणनीति: इंतजार और निगरानी के पीछे छिपा डर क्या है?

ईरान को लेकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘वेट एंड वॉच’ यानी इंतजार और निगरानी की नीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है। ट्रंप अपने कार्यकाल के दौरान जहां एक ओर ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए जाने गए, वहीं दूसरी ओर सीधे सैन्य कार्रवाई से अक्सर पीछे हटते नजर आए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि ईरान के साथ टकराव सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व को युद्ध की आग में झोंक सकता है।

ट्रंप को सबसे बड़ा डर क्षेत्रीय युद्ध के फैलने का था। ईरान के इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में प्रभावशाली सहयोगी हैं, जैसे हिजबुल्लाह और हूती विद्रोही। यदि अमेरिका ईरान पर सीधा हमला करता, तो इसका जवाब इन संगठनों के जरिए अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों पर हमलों के रूप में मिल सकता था। इससे न केवल अमेरिका की सुरक्षा चुनौती बढ़ती, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति भी प्रभावित होती।

दूसरा अहम कारण अमेरिकी घरेलू राजनीति थी। ट्रंप खुद को “नो न्यू वॉर” यानी नई जंग न शुरू करने वाले नेता के रूप में पेश करना चाहते थे। अमेरिका पहले ही अफगानिस्तान और इराक युद्धों से थक चुका था और जनता किसी नए लंबे युद्ध के मूड में नहीं थी। ऐसे में ईरान के खिलाफ जल्दबाजी में उठाया गया कदम ट्रंप की छवि और चुनावी रणनीति दोनों को नुकसान पहुंचा सकता था।

इसके अलावा ट्रंप प्रशासन को यह भी डर था कि ईरान परमाणु कार्यक्रम को और तेज कर सकता है। यदि हालात पूरी तरह बिगड़ते, तो ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में खुलकर आगे बढ़ सकता था, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों की मुश्किलें कई गुना बढ़ जातीं। इसलिए दबाव, प्रतिबंध और कूटनीति के जरिए ईरान को नियंत्रित रखना ज्यादा सुरक्षित विकल्प माना गया।

कुल मिलाकर ट्रंप की ‘वेट एंड वॉच’ नीति एक संतुलन की कोशिश थी—जहां एक तरफ ईरान पर सख्ती दिखाई जाए, वहीं दूसरी ओर ऐसा कोई कदम न उठाया जाए जिससे हालात बेकाबू हो जाएं। यही डर और रणनीतिक सोच ट्रंप को ईरान के मामले में सीधे टकराव से दूर रखे हुए थी।

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