
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में प्रख्यात लेखिका और समाजसेवी सुधा मूर्ति ने बच्चों को देश के बंटवारे के इतिहास से अवगत कराने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी जिस स्वतंत्र भारत में सांस ले रही है, उसके पीछे आज़ादी के साथ-साथ बंटवारे का दर्दनाक अध्याय भी जुड़ा है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। सुधा मूर्ति के अनुसार, इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह समाज की स्मृति और चेतना को आकार देता है। यदि बच्चों को बंटवारे की सच्चाई नहीं बताई जाएगी, तो वे उस संघर्ष, त्याग और पीड़ा को नहीं समझ पाएंगे, जिसके बाद आज का भारत अस्तित्व में आया। उन्होंने कहा कि बंटवारे के दौरान लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, अनगिनत परिवार बिछुड़ गए और साम्प्रदायिक हिंसा में असंख्य जानें गईं। यह सब जानना इसलिए भी जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां नफरत, विभाजन और हिंसा के दुष्परिणामों को समझ सकें।
सुधा मूर्ति ने यह भी कहा कि बच्चों को इतिहास सिखाने का तरीका संवेदनशील और मानवीय होना चाहिए। डर या घृणा पैदा करने के बजाय उन्हें मानवीय मूल्यों, सहिष्णुता और आपसी सम्मान का महत्व समझाया जाना चाहिए। बंटवारे की कहानियां केवल दर्द की नहीं हैं, बल्कि उनमें साहस, सहानुभूति और पुनर्निर्माण की मिसालें भी छिपी हैं। उन्होंने शिक्षकों और अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों के सवालों से न बचें, बल्कि ईमानदारी और सरल भाषा में उन्हें उत्तर दें। इससे बच्चों में आलोचनात्मक सोच विकसित होगी और वे इतिहास से सीख लेकर बेहतर भविष्य का निर्माण कर पाएंगे।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसे मंच पर उठाई गई यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के डिजिटल युग में जानकारी तो बहुत है, लेकिन संदर्भ और समझ का अभाव है। सुधा मूर्ति ने कहा कि यदि हम अपने बच्चों को सच्चा और संतुलित इतिहास नहीं बताएंगे, तो अधूरी या गलत जानकारी उनके मन में भ्रम पैदा कर सकती है। बंटवारे के इतिहास को जानना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को अधिक मानवीय, शांतिपूर्ण और एकजुट बनाने की दिशा में एक जरूरी कदम है।



