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ओवैसी का केंद्र पर निशाना: पाक से क्रिकेट क्यों, जब खून बह रहा?

भारत-पाकिस्तान के बीच हमेशा से ही संबंधों में तनाव रहा है — चाहे वो सीमा पर संघर्ष हो, आतंकी हमले हों या फिर कूटनीतिक मतभेद। ऐसे माहौल में जब दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच आयोजित होते हैं, तब सवाल उठने लाज़मी हैं। इसी मुद्दे पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा, “जब पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते, तो पाकिस्तान से क्रिकेट मैच कैसे हो सकता है?”

ओवैसी का बयान उस समय आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच का कार्यक्रम तय किया गया है और टिकटों की बुकिंग भी ज़ोरों पर है। लेकिन इसी बीच एलओसी (LOC) और जम्मू-कश्मीर के इलाकों में पाकिस्तान की ओर से लगातार सीजफायर उल्लंघन और आतंकी गतिविधियाँ जारी हैं।

ओवैसी ने कहा, “केंद्र सरकार एक ओर पाकिस्तान को आतंकवाद का गढ़ बताती है, और दूसरी ओर उसी देश के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्रिकेट खेलने की अनुमति देती है। यह दोहरा मापदंड है। जब हमारे सैनिक सीमा पर खून बहा रहे हैं, तो क्या स्टेडियम में पाकिस्तान के खिलाफ तालियाँ बजाना न्यायोचित है?”

उन्होंने केंद्र सरकार से सवाल किया कि क्या सिर्फ टीआरपी और पैसे कमाने के लिए इस तरह के मैच करवाना जरूरी है? क्या राष्ट्रीय गौरव और शहीदों के बलिदान का कोई मूल्य नहीं बचा?

ओवैसी के इस बयान को जहां कुछ लोग राष्ट्रभक्ति की भावना से प्रेरित मान रहे हैं, वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह एक सोची-समझी राजनीति है जिससे राष्ट्रवाद और धर्म आधारित वोट बैंक को प्रभावित किया जा सके।

सरकार की ओर से अभी तक ओवैसी के इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन बीजेपी के कुछ नेताओं ने अनौपचारिक रूप से कहा कि खेल और राजनीति को अलग रखना चाहिए। उनका तर्क है कि भारत-पाक क्रिकेट मैचों पर आम जनता की भावना जुड़ी होती है और ऐसे मैचों से भारत को वैश्विक मंच पर अपनी कुशलता और प्रतिस्पर्धात्मकता दिखाने का मौका मिलता है।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब भारत-पाक क्रिकेट को लेकर विवाद हुआ हो। इससे पहले भी उरी हमला, पुलवामा हमले के बाद ऐसे मैचों पर रोक लगाने की माँग उठी थी।

निष्कर्षतः, ओवैसी का बयान एक बार फिर यह बहस छेड़ रहा है कि क्या भारत को पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह के खेल या सांस्कृतिक संबंध रखने चाहिए, जब तक सीमा पर शांति बहाल नहीं होती। यह सवाल न सिर्फ राजनीतिक है, बल्कि भावनात्मक भी — खासकर उन परिवारों के लिए जिन्होंने अपने सपूतों को सीमा पर खोया है।

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