
देश में आम बजट को लेकर इस बार एक नई चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या केंद्र सरकार इस बार रविवार को ही आम बजट पेश कर सकती है। अब तक की परंपरा पर नजर डालें तो बजट हमेशा कार्यदिवस यानी सोमवार से शुक्रवार के बीच ही संसद में प्रस्तुत किया जाता रहा है। सप्ताहांत, विशेषकर रविवार को बजट पेश करने की मिसाल लगभग नहीं के बराबर रही है। ऐसे में अगर सरकार यह कदम उठाती है तो यह दशकों पुरानी परंपरा में बड़ा बदलाव माना जाएगा। इसी कड़ी में आज होने वाली एक अहम बैठक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें बजट की तारीख और प्रक्रिया को लेकर अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार प्रशासनिक सहूलियत, बाजार की स्थिरता और संसद के कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए बजट की तारीख पर पुनर्विचार कर रही है। रविवार को बजट पेश करने का एक तर्क यह भी बताया जा रहा है कि इससे शेयर बाजारों को प्रतिक्रिया देने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है और निवेशकों को नीतियों को समझने का बेहतर अवसर मिलेगा। इसके अलावा, सरकार चाहती है कि बजट के प्रमुख प्रावधानों पर देशभर में व्यापक चर्चा हो, जिसके लिए सप्ताहांत को अनुकूल माना जा रहा है।
हालांकि, परंपरा से हटकर कोई भी फैसला राजनीतिक और संसदीय दृष्टि से आसान नहीं होता। विपक्षी दल इसे संसद की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जोड़कर सवाल उठा सकते हैं। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते समय के साथ परंपराओं में बदलाव स्वाभाविक है, बशर्ते इससे पारदर्शिता और प्रभावशीलता बढ़े। सरकार पहले ही बजट को शाम 5 बजे की बजाय सुबह 11 बजे पेश करने जैसी परंपरा बदल चुकी है, ऐसे में रविवार को बजट पेश करना भी उसी दिशा में एक और कदम माना जा सकता है।
फिलहाल, सबकी नजर आज की बैठक पर टिकी है, जहां से इस अटकल पर मुहर लग सकती है या इसे पूरी तरह खारिज किया जा सकता है। यदि सरकार रविवार को बजट पेश करने का फैसला करती है, तो यह न केवल एक ऐतिहासिक निर्णय होगा, बल्कि भविष्य में बजट प्रस्तुत करने की परंपरा को भी नई दिशा दे सकता है। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार परंपरा को प्राथमिकता देती है या व्यावहारिकता को।
