
भारत में महिला सशक्तिकरण और समानता की दिशा में लगातार प्रयास हो रहे हैं, लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने महिला दिवस 2026 के अवसर पर एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, समाज की सोच में बदलाव भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने अपने संबोधन में परिवार और घर के स्तर पर महिलाओं के प्रति भेदभाव को खत्म करने की अपील की। राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि महिलाओं की वास्तविक समानता तभी संभव है जब घर-परिवार में उनके अधिकारों, सम्मान और निर्णय लेने की क्षमता को स्वीकार किया जाए।
राष्ट्रपति ने महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व क्षमता को भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जब तक परिवार और समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक सिर्फ कानून बनाकर समानता हासिल करना संभव नहीं है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने घर और समाज में लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाएं और महिला सशक्तिकरण के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं।
उन्होंने यह भी बताया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को रोकने के लिए सरकार ने कई कानून बनाए हैं, लेकिन उनका सही मायनों में असर तभी दिखाई देगा जब समाज में मानसिकता बदले। राष्ट्रपति ने घर के छोटे-छोटे कामों में भी महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही समानता का संस्कार देना जरूरी है ताकि समाज में लैंगिक भेदभाव की सोच धीरे-धीरे समाप्त हो सके।
राष्ट्रपति मुर्मु ने महिलाओं को भी प्रोत्साहित किया कि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, अपनी आवाज उठाएं और अपने जीवन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण सिर्फ सरकारी योजनाओं और कानूनों से नहीं बल्कि हर घर में सम्मान और बराबरी की सोच से संभव होगा।
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने यह भी आशा जताई कि आने वाले समय में भारत एक ऐसा समाज बनेगा जहां महिला और पुरुष के बीच कोई भेदभाव न हो, और हर महिला अपनी क्षमता के अनुसार समाज में योगदान कर सके। उनका संदेश स्पष्ट था – “समानता सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण से आएगी।”
महिला दिवस पर राष्ट्रपति मुर्मु का यह संदेश न केवल महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रेरक है, बल्कि समाज को यह याद दिलाने के लिए भी महत्वपूर्ण है कि बदलाव की शुरुआत घर से होती है।



