
करीब 16 वर्षों के अंतराल के बाद भारत ने एक बार फिर हिंद महासागर क्षेत्र की अहम बहुपक्षीय समुद्री संस्था आईओएनएस (Indian Ocean Naval Symposium) की अध्यक्षता संभाल ली है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी तथा भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। भारत की यह जिम्मेदारी न केवल उसकी बढ़ती सामरिक शक्ति को दर्शाती है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करती है।
आईओएनएस की स्थापना वर्ष 2008 में भारत की पहल पर हुई थी, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर से जुड़े देशों की नौसेनाओं के बीच सहयोग, विश्वास और समन्वय को बढ़ाना है। इस मंच के माध्यम से सदस्य देश समुद्री आपदाओं से निपटने, मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) अभियानों, समुद्री कानून प्रवर्तन और सामूहिक सुरक्षा पर विचार-विमर्श करते हैं। भारत ने पहले भी अपनी अध्यक्षता के दौरान क्षेत्रीय सहयोग को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में हिंद महासागर का महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि यह दुनिया के प्रमुख व्यापारिक समुद्री मार्गों का केंद्र है। विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। ऐसे में समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी सदस्य देशों की प्राथमिकता बन गया है। भारत ने अध्यक्षता संभालते हुए स्पष्ट किया है कि वह ‘सागर’ (Security and Growth for All in the Region) की नीति के तहत सभी देशों के साथ मिलकर काम करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन की बदलती परिस्थितियों के बीच भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। भारत की नौसेना पहले से ही एंटी-पायरेसी ऑपरेशन, मानवीय सहायता और संयुक्त अभ्यासों में सक्रिय रही है। अब आईओएनएस की अध्यक्षता के माध्यम से भारत को क्षेत्रीय रणनीतिक संवाद को दिशा देने का अवसर मिलेगा।
कुल मिलाकर, भारत की यह नई जिम्मेदारी हिंद महासागर क्षेत्र में स्थायी शांति, सुरक्षा और सामूहिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस मंच का उपयोग किस प्रकार क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत बनाने में करता है।



