सोमनाथ ज्योतिर्लिंग और चंद्रदेव की अद्भुत कथा – जानिए पूरा रहस्य

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, जिसे द्वारकाधीश भगवान कृष्ण की नगरी के पास स्थित एक पवित्र शिवधाम के रूप में जाना जाता है, बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला और सबसे प्राचीन माना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग का सीधा संबंध चंद्रदेव से जुड़ी एक रोचक और अद्भुत कथा से है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, चंद्रदेव ने दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों से विवाह किया था, जो सभी नक्षत्र थीं। इनमें से चंद्रदेव को रोहिणी सबसे प्रिय थीं। चंद्रदेव का यह पक्षपात देखकर बाकी पत्नियां क्रोधित हो गईं और उन्होंने अपने पिता दक्ष प्रजापति से शिकायत की। दक्ष ने चंद्रदेव को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं माने।
क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि उनका तेज क्षीण हो जाएगा और वे धीरे-धीरे क्षीण होते-होते विलीन हो जाएंगे। श्राप से पीड़ित चंद्रदेव ने सभी देवताओं से मदद मांगी, लेकिन कोई भी उन्हें श्राप से मुक्त नहीं कर सका। अंततः ब्रह्मा जी के मार्गदर्शन में चंद्रदेव ने प्रभास तीर्थ (वर्तमान सोमनाथ) में आकर भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें श्राप से मुक्त किया और कहा कि वे मास में एक बार क्षीण होंगे और फिर बढ़ेंगे। यही कारण है कि चंद्रमा का कलावान होना और अमावस्या-पूर्णिमा का चक्र चलता है।
भगवान शिव यहां सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए, जिसका अर्थ है – “सोम” यानी चंद्र और “नाथ” यानी स्वामी। तब से यह स्थान न केवल शिवभक्तों के लिए, बल्कि चंद्रमा से जुड़ी आध्यात्मिक मान्यताओं के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थ बन गया। सोमनाथ मंदिर ने इतिहास में कई बार आक्रमण झेले, लेकिन हर बार इसका पुनर्निर्माण हुआ और यह श्रद्धा व अटूट आस्था का प्रतीक बना रहा। आज भी, लाखों श्रद्धालु यहां आकर भगवान सोमनाथ के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य मानते हैं।



