हरियाली तीज पर मिट्टी के शिवलिंग, गौरी और गणेश क्यों बनाते हैं? जानें धार्मिक महत्व

सावन के महीने में मनाई जाने वाली हरियाली तीज भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित प्रमुख पर्वों में से एक है। मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए की गई अपनी कठोर तपस्या का फल पाया और शिव-पार्वती का पुनर्मिलन हुआ। इसलिए इस दिन सुहागिन महिलाएं सुखी दांपत्य और पति की दीर्घायु की कामना से व्रत-पूजन करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की कामना से पूजा करती हैं।
मिट्टी से ही क्यों बनाते हैं शिवलिंग और प्रतिमाएं?
हरियाली तीज की कई पारंपरिक पूजा-विधियों में शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, भगवान गणेश और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाने का विधान बताया गया है। कुछ परंपराओं में शिव-पार्वती के साथ उनकी सखियों की प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं।
मिट्टी का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मिट्टी प्रकृति और धरती से जुड़ी हुई है और हरियाली तीज स्वयं सावन की हरियाली, वर्षा और प्रकृति के नवजीवन से जुड़ा पर्व है। इसलिए मिट्टी से देवी-देवताओं के स्वरूप बनाना प्रकृति और आराधना के बीच संबंध को दर्शाने वाली परंपरा के रूप में देखा जाता है।
शिवलिंग बनाने का क्या महत्व है?
पूजा में मिट्टी से बनाया गया शिवलिंग भगवान शिव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से भगवान शिव का पूजन किया जाता है। हरियाली तीज का मुख्य धार्मिक भाव शिव और पार्वती के दांपत्य संबंध से जुड़ा है, इसलिए शिवलिंग के साथ माता गौरी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
गौरी जी की प्रतिमा क्यों बनाई जाती है?
माता पार्वती को गौरी के रूप में भी पूजा जाता है। हरियाली तीज में गौरी पूजन का संबंध सौभाग्य, दांपत्य सुख और शिव-पार्वती के आदर्श वैवाहिक संबंध से जोड़ा जाता है। महिलाएं माता गौरी को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। इसी वजह से तीज के व्रत में पार्वती की भक्ति और तपस्या को विशेष रूप से स्मरण किया जाता है।
साथ में गणेश जी को क्यों बनाते हैं?
पूजा में गणेश जी की प्रतिमा भी बनाई जाती है। हिंदू धार्मिक परंपरा में गणेश जी को विघ्नहर्ता और शुभारंभ के देवता माना जाता है। इसलिए शिव-पार्वती के पूजन के साथ गणेश जी की पूजा करना भी कई तीज पूजा-विधियों का हिस्सा है। पारंपरिक विधियों में शिवलिंग, पार्वती और गणेश की मिट्टी की प्रतिमाएं एक साथ बनाने का उल्लेख मिलता है।
इस परंपरा के पीछे क्या संदेश है?
हरियाली तीज पर मिट्टी के शिवलिंग और प्रतिमाएं बनाने की परंपरा को केवल पूजा की विधि के तौर पर नहीं देखा जाता। इसमें प्रकृति, सादगी, भक्ति और पारिवारिक सुख का भाव भी जुड़ा है। सावन में धरती हरी-भरी होती है और प्रकृति में नया जीवन दिखाई देता है। ऐसे समय मिट्टी से देवस्वरूप बनाकर पूजा करना प्रकृति के प्रति सम्मान का सांस्कृतिक संदेश भी देता है।
पूजा के बाद मिट्टी की प्रतिमाओं को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं हैं, इसलिए स्थानीय रीति और परिवार की परंपरा के अनुसार ही विसर्जन या अन्य विधि करना उचित माना जाता है।
नोट: मिट्टी की प्रतिमाएं बनाना हरियाली तीज की सभी परंपराओं में अनिवार्य नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा-विधि अलग हो सकती है। ऊपर बताई गई बातें धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित पूजा-परंपराओं पर आधारित हैं।



