
कर्नाटक के मैसूरु दशहरा कार्यक्रम को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, इस भव्य धार्मिक आयोजन में मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाली बानू मुश्ताक को आमंत्रित किए जाने पर बीजेपी ने कड़ा एतराज जताया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि दशहरा हिंदू धर्म और परंपराओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आयोजन है, जिसमें गैर-हिंदू को मंच पर जगह देना धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने जैसा है। इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है और सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है।
दशहरा महोत्सव कर्नाटक के सबसे प्रमुख आयोजनों में से एक है, जो हर साल बड़े पैमाने पर संपन्न होता है। इस आयोजन में सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों का संगम देखने को मिलता है। लेकिन इस बार मुस्लिम महिला बानू मुश्ताक को मंच पर बुलाने और उन्हें सम्मानित करने पर विपक्षी दलों ने बीजेपी पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस और जेडीएस नेताओं का कहना है कि दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि सांस्कृतिक उत्सव है, जिसमें सभी धर्म और समुदाय की भागीदारी होनी चाहिए।
बीजेपी नेताओं का तर्क है कि हिंदू धार्मिक मंच पर मुस्लिम महिला को बुलाना आयोजन की परंपराओं के विपरीत है। उनका कहना है कि इस तरह के कदम से समाज में गलत संदेश जाता है और यह धार्मिक परंपराओं की अवहेलना है। दूसरी ओर, समर्थक यह दलील दे रहे हैं कि बानू मुश्ताक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उन्हें मंच पर बुलाना किसी धर्म का अपमान नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है।
इस विवाद के चलते मैसूरु दशहरा का सांस्कृतिक महत्व राजनीति की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। जहां एक ओर दशहरा उत्सव बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर इस विवाद ने धार्मिक असहिष्णुता और राजनीति के दखल की ओर इशारा कर दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या धार्मिक आयोजनों को राजनीति से जोड़ना सही है, या फिर उन्हें एकता और भाईचारे के मंच के रूप में देखा जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के विवाद समाज में दूरियाँ बढ़ाते हैं। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में सांस्कृतिक आयोजनों को सभी धर्मों के लोगों के लिए साझा मंच बनाना चाहिए। मैसूरु दशहरा हमेशा से ही भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक रहा है और इसे विवाद का केंद्र बनाने के बजाय सांप्रदायिक सौहार्द और एकता का संदेश देने वाला मंच बनाना चाहिए।



