
राज्यसभा में दवाओं की कीमतों में भारी असमानता को लेकर जोरदार हंगामा देखने को मिला। कई सदस्यों ने एक ही दवा के अलग-अलग ब्रांड्स में कीमतों के बड़े अंतर पर चिंता जताई और सरकार से इस पर सख्त कानून बनाने की मांग की। उनका कहना था कि इससे आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है और स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होती जा रही हैं।
सदस्यों ने सरकार से दवा कंपनियों पर कड़ी निगरानी रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि आवश्यक दवाओं की कीमतें सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। इस मुद्दे पर सरकार की ओर से जवाब देते हुए आश्वासन दिया गया कि मरीजों के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित कार्रवाई की जाएगी।
बहस के दौरान कुछ सदस्यों ने यह भी मुद्दा उठाया कि कई दवाओं के जेनेरिक और ब्रांडेड वर्जन के बीच कीमतों में भारी अंतर होता है, जिससे मरीजों को भ्रम और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। उन्होंने डॉक्टरों द्वारा महंगी दवाएं लिखने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए और पारदर्शिता बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
सदन में यह सुझाव भी दिया गया कि दवाओं की कीमत तय करने वाली एजेंसियों को और अधिक सशक्त बनाया जाए, ताकि वे बाजार में हो रही मनमानी पर रोक लगा सकें। साथ ही, आम लोगों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर दिया गया।



