वटसावित्री व्रत 2026: उत्तर और दक्षिण भारत में अलग क्यों होती है तिथि?

वटसावित्री व्रत हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत माता सावित्री की अपने पति सत्यवान के प्रति अटूट समर्पण और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। खास बात यह है कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत में इस व्रत की तिथि अलग-अलग मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका कारण दोनों क्षेत्रों में प्रचलित अलग पंचांग प्रणालियां हैं। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को जबकि दक्षिण भारत के कई हिस्सों में ज्येष्ठ पूर्णिमा के आसपास मनाया जाता है।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार उत्तर भारत में अमांत पंचांग का अधिक प्रचलन है, जिसमें माह का समापन अमावस्या से माना जाता है। वहीं दक्षिण भारत के कई राज्यों में पूर्णिमांत पंचांग का पालन किया जाता है, जहां महीने का अंत पूर्णिमा पर होता है। इसी पंचांग भिन्नता के कारण वटसावित्री व्रत की तिथियों में अंतर देखने को मिलता है। हालांकि तिथि अलग होने के बावजूद व्रत का उद्देश्य और धार्मिक महत्व दोनों क्षेत्रों में समान रहता है।
पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप, बुद्धि और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य, समर्पण और नारी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधकर पूजा करती हैं और परिवार की सुख-शांति की कामना करती हैं। आधुनिक समय में भी यह पर्व भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की गहरी झलक प्रस्तुत करता है।



