नेपाल की पहली सुरंग नागढुंगा शुरू, भारत के लिए क्यों अहम?

नेपाल ने अपनी पहली आधुनिक पर्वतीय सड़क सुरंग नागढुंगा-सिस्ने खोला को यातायात के लिए शुरू कर एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्धि हासिल की है। करीब 2.68 किलोमीटर लंबी यह सुरंग काठमांडू घाटी को पश्चिमी नेपाल से जोड़ती है। जापान की आधिकारिक विकास सहायता (ODA) से तैयार इस परियोजना से पहाड़ी और घुमावदार रास्तों पर निर्भरता कम होगी तथा यातायात को तेज और सुरक्षित बनाने में मदद मिलेगी।
इस सुरंग का सबसे बड़ा फायदा यात्रा समय में कमी के रूप में सामने आएगा। नागढुंगा क्षेत्र में पहले ट्रैफिक जाम के कारण सफर में एक घंटे से ज्यादा समय लग सकता था, जबकि सुरंग से यह दूरी करीब 5 से 7 मिनट में पूरी होने की उम्मीद है। इससे काठमांडू आने-जाने वाले यात्रियों के साथ मालवाहक वाहनों को भी राहत मिलेगी।
भारत के लिए भी यह परियोजना अहम है, क्योंकि त्रिभुवन हाईवे नेपाल की राजधानी को पश्चिमी हिस्सों और भारत से जुड़े प्रमुख व्यापार मार्गों से जोड़ता है। काठमांडू में प्रवेश करने वाले बड़ी मात्रा में माल की आवाजाही इसी कॉरिडोर से होती है। बेहतर सड़क कनेक्टिविटी से भारत-नेपाल व्यापार, लॉजिस्टिक्स और माल परिवहन को गति मिलने की उम्मीद है।
सुरंग का महत्व केवल समय बचाने तक सीमित नहीं है। नेपाल में भूस्खलन और भारी बारिश के कारण सड़कें अक्सर बाधित होती हैं। सुरंग एक वैकल्पिक और अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराती है, जिससे आपदा या खराब मौसम के दौरान भी काठमांडू तक जरूरी सामान और आपात सेवाओं की पहुंच बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
इस परियोजना से नेपाल की परिवहन व्यवस्था में आधुनिक सुरंग तकनीक के इस्तेमाल की शुरुआत भी हुई है। आगे चलकर देश के दूसरे पहाड़ी इलाकों में ऐसे प्रोजेक्ट विकसित करने का रास्ता आसान हो सकता है। भारत के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि नेपाल के साथ मजबूत सड़क और व्यापारिक कनेक्टिविटी दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को और मजबूत कर सकती है।



