
ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर हुआ समझौता वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। दोनों देशों ने जहाजों की आवाजाही को बेहतर बनाने के लिए नए प्रवेश और निकास मार्गों पर सहमति बनाई है।
होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट में शामिल है। यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की सप्लाई पर पड़ सकता है। मौजूदा तनाव के कारण पहले ही वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है।
भारत के लिए यह समझौता इसलिए खास है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों में मध्य पूर्व की महत्वपूर्ण भूमिका है। अगर होर्मुज के रास्ते टैंकरों की आवाजाही सुरक्षित और नियमित होती है तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति में अनिश्चितता कम हो सकती है।
तेल की सप्लाई में सुधार का असर कीमतों पर भी पड़ सकता है। हाल के घटनाक्रमों के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। ऐसे में होर्मुज से जुड़े किसी भी सकारात्मक घटनाक्रम पर तेल बाजार की नजर बनी हुई है।
हालांकि, इस समझौते को होर्मुज के तत्काल और पूरी तरह खुलने के रूप में देखना सही नहीं होगा। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान-ओमान समझ में तत्काल पुनःखोलने का प्रावधान नहीं है और आगे की स्थिति कुछ शर्तों पर निर्भर करती है।
ग्लोबल ट्रेड के लिहाज से भी होर्मुज की सुरक्षा बेहद अहम है। तेल टैंकरों के अलावा समुद्री परिवहन की लागत, बीमा प्रीमियम और जहाजों के रूट पर भी इसका असर पड़ सकता है। लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर इसका प्रभाव एशिया से लेकर यूरोप तक देखने को मिल सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि ऊर्जा आपूर्ति को लेकर जोखिम कम हो। सुरक्षित समुद्री मार्ग मिलने से भारतीय कंपनियों को आयात की योजना बनाने में मदद मिल सकती है और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी का दबाव कुछ कम हो सकता है।
कुल मिलाकर, ईरान-ओमान समझौता होर्मुज संकट को कम करने की दिशा में एक अहम कदम है, लेकिन इसे अंतिम समाधान कहना अभी जल्दबाजी होगी। आगे होने वाली क्षेत्रीय बातचीत और जहाजों की वास्तविक आवाजाही यह तय करेगी कि इस समझौते का भारत, तेल बाजार और वैश्विक व्यापार को कितना फायदा मिलता है।



