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भारत का सबसे पुराना बैंक: कैसे बदला नाम और पहचान, जानिए पूरी कहानी

भारत का सबसे पुराना बैंक कौन-सा है, यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है और इसका जवाब हमें देश की बैंकिंग व्यवस्था के इतिहास में ले जाता है। आज जिस बैंक को हम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के नाम से जानते हैं, उसकी जड़ें करीब दो सदियों से भी ज्यादा पुरानी हैं। इसकी शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी, जब 2 जून 1806 को कोलकाता में बैंक ऑफ कलकत्ता की स्थापना की गई। यह बैंक ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में शुरू हुआ था और उस समय इसका उद्देश्य व्यापार, राजस्व संग्रह और प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करना था। बाद में 1809 में इसका नाम बदलकर बैंक ऑफ बंगाल कर दिया गया। समय के साथ मद्रास और बॉम्बे में भी बैंक ऑफ मद्रास (1843) और बैंक ऑफ बॉम्बे (1840) की स्थापना हुई। इन तीनों बैंकों को मिलाकर 1921 में इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया बनाया गया, जो उस दौर का सबसे बड़ा और प्रभावशाली बैंक बन गया। आजादी के बाद देश को एक मजबूत और जन-केंद्रित बैंकिंग प्रणाली की जरूरत महसूस हुई, जिसके चलते 1955 में इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण कर इसे नया नाम दिया गया—स्टेट बैंक ऑफ इंडिया। इस परिवर्तन के साथ न सिर्फ बैंक का नाम बदला, बल्कि उसकी पहचान भी पूरी तरह बदल गई। पहले जहां यह बैंक मुख्य रूप से शहरी और व्यापारिक वर्ग तक सीमित था, वहीं SBI बनने के बाद इसका उद्देश्य गांव-गांव तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना बना। किसानों, छोटे व्यापारियों, छात्रों और आम नागरिकों के लिए खाते, ऋण और बचत योजनाएं शुरू की गईं। समय के साथ SBI ने तकनीक को अपनाया, एटीएम, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट जैसी सुविधाएं शुरू कीं, जिससे यह आधुनिक भारत की आर्थिक रीढ़ बन गया। आज SBI सिर्फ एक बैंक नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक प्रगति का प्रतीक है, जिसने औपनिवेशिक दौर से लेकर डिजिटल युग तक खुद को लगातार बदला और देश के करोड़ों लोगों का भरोसा जीता।

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