
बॉम्बे हाईकोर्ट में हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान एक ऐसी टिप्पणी सामने आई जिसने जैन समुदाय को गहराई से आहत किया। सुनवाई के दौरान अदालत में जैन पक्ष ने अपनी धार्मिक मान्यताओं और उपवास की परंपरा को लेकर तर्क प्रस्तुत किए। इस दौरान न्यायाधीश ने कहा—“अकबर को मना सकते हैं, लेकिन इनको नहीं…”। यह टिप्पणी सीधे तौर पर जैन समुदाय के धार्मिक आग्रहों और उनके अटूट संकल्प पर व्यंग्य के रूप में देखी गई। अदालत की इस टिप्पणी के बाद जैन समाज ने तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि उनकी धार्मिक आस्थाओं को हल्के में लेना न केवल अपमानजनक है बल्कि भारतीय संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का भी उल्लंघन है।
जैन धर्म अपने तप, संयम और कठोर उपवासों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। जैन साधु और साध्वियां अक्सर लंबे समय तक उपवास करके आत्मशुद्धि और आत्मसंयम की मिसाल पेश करते हैं। उनके लिए यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि जीवन जीने का एक अनुशासन और दर्शन है। ऐसे में जब अदालत जैसी संवैधानिक संस्था उनकी आस्थाओं पर व्यंग्य करे तो स्वाभाविक है कि समाज में आक्रोश फैले। जैन समुदाय ने इसे अपनी धार्मिक गरिमा के खिलाफ बताया और न्यायपालिका से अपेक्षा की कि वह इस पर स्पष्ट स्पष्टीकरण दे।
दरअसल, विवाद की जड़ जैन धर्म के पवित्र पर्व “पर्युषण” और “संविधान दिवस” की गतिविधियों को लेकर है, जहाँ अक्सर उपवास और अन्य धार्मिक आयोजनों को लेकर प्रशासनिक दखल सामने आता है। कई बार नगर निगम या राज्य प्रशासन द्वारा जैन धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाने या उन्हें सीमित करने की कोशिश की गई है। इसको लेकर जैन समाज बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाता रहा है। लेकिन हालिया टिप्पणी ने आग में घी डालने का काम किया।
जैन समुदाय का कहना है कि भारत की विविधता और लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि हर धर्म को अपनी मान्यताओं के अनुसार जीने की स्वतंत्रता है। जैन साधु-संतों की तपस्या और उपवास का सम्मान दुनिया भर में होता है, ऐसे में अदालत से ऐसी टिप्पणी की उम्मीद किसी ने नहीं की थी। समाज के नेताओं का कहना है कि “अकबर को मना सकते हैं, लेकिन इनको नहीं…” जैसी बातें असंवेदनशीलता और अज्ञानता का उदाहरण हैं।
इस घटना के बाद जैन समाज ने कई जगह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए और केंद्र तथा राज्य सरकार से मांग की कि इस मुद्दे पर न्यायपालिका को संवेदनशील बनाया जाए। उनका कहना है कि धर्म और आस्था पर चोट पहुंचाना समाज के एक बड़े वर्ग को आहत करता है, जो देश की एकता और सौहार्द्र के लिए ठीक नहीं है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर धार्मिक स्वतंत्रता और न्यायिक टिप्पणी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। जैन समुदाय चाहता है कि अदालतें उनकी आस्था को समझें और उसके सम्मान में फैसले लें, न कि ऐसी टिप्पणी करें जिससे समाज में अविश्वास और असंतोष बढ़े।



