
अमेरिका के टेक्सस राज्य में H-1B वीजा को लेकर गवर्नर द्वारा लगाए गए “ब्रेक” ने प्रवासी कामगारों, खासकर भारतीय पेशेवरों के बीच चिंता बढ़ा दी है। H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कुशल श्रमिकों को नियुक्त करने की अनुमति देता है, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीयों की होती है। टेक्सस, जो आईटी, एनर्जी, हेल्थकेयर और स्टार्टअप्स का बड़ा केंद्र है, वहां इस फैसले के दूरगामी असर की आशंका जताई जा रही है।
गवर्नर के इस कदम का मकसद राज्य में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और वीजा प्रणाली के दुरुपयोग को रोकना बताया जा रहा है। हालांकि, यह “ब्रेक” पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, बल्कि सरकारी ठेकों और कुछ विशेष क्षेत्रों में H-1B कर्मचारियों की नियुक्ति पर अतिरिक्त जांच और शर्तों को लागू करने से जुड़ा है। इसके तहत कंपनियों से यह स्पष्ट करने को कहा जा सकता है कि विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति क्यों जरूरी है और क्या स्थानीय प्रतिभा उपलब्ध नहीं है।
भारतीय पेशेवरों के लिए इसका असर मिला-जुला हो सकता है। जिन कंपनियों में पहले से H-1B पर काम कर रहे कर्मचारी हैं, उनकी नौकरियों पर तत्काल खतरा नहीं माना जा रहा है। लेकिन नई भर्तियों, वीजा ट्रांसफर और एक्सटेंशन की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। खासतौर पर आईटी सर्विस कंपनियों और स्टार्टअप्स को अतिरिक्त अनुपालन (कम्प्लायंस) का सामना करना पड़ सकता है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था अभी भी कुशल तकनीकी प्रतिभा पर निर्भर है और भारतीय प्रोफेशनल्स इस जरूरत को पूरा करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए दीर्घकाल में पूरी तरह से H-1B पर रोक लगना मुश्किल है। साथ ही, संघीय स्तर पर वीजा नीति का नियंत्रण होता है, राज्य सरकारें केवल अपने दायरे में नियम सख्त कर सकती हैं।
भारतीयों के लिए सलाह यही है कि वे अपनी कंपनी के इमिग्रेशन टीम के संपर्क में रहें, दस्तावेज़ों को अपडेट रखें और वैकल्पिक वीजा विकल्पों जैसे L-1 या ग्रीन कार्ड प्रोसेस पर भी विचार करें। कुल मिलाकर, टेक्सस का यह फैसला अल्पकालिक अनिश्चितता जरूर पैदा करता है, लेकिन भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका के दरवाजे पूरी तरह बंद होने की आशंका फिलहाल कम ही है।



