
वेनेजुएला के बाद अब एक बार फिर अमेरिका पर किसी दूसरे देश में तख्तापलट की साजिश रचने के आरोप लग रहे हैं। इस बार चर्चा में क्यूबा (या ईरान/उत्तर कोरिया जैसे देशों का संदर्भ) का नाम सामने आ रहा है, जहां पहले से ही अमेरिका और स्थानीय सरकार के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। ट्रंप ने कहा कि “एक दमनकारी सरकार जल्द ही गिरेगी” और वहां के लोगों को आज़ादी मिलेगी। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इस बयान को अमेरिकी विदेश नीति के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका लंबे समय से उन देशों पर दबाव बनाता रहा है, जो उसकी रणनीतिक और आर्थिक नीतियों से सहमत नहीं होते। वेनेजुएला इसका बड़ा उदाहरण रहा है, जहां अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंधों, विपक्षी नेताओं को समर्थन और अंतरराष्ट्रीय दबाव के जरिए सरकार को कमजोर करने की कोशिश की। अब इसी तरह की रणनीति किसी अन्य देश में अपनाए जाने की आशंका जताई जा रही है।
ट्रंप का बयान ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी भी तेज हो रही है। माना जा रहा है कि सख्त विदेश नीति और ‘अमेरिका फर्स्ट’ जैसे बयानों के जरिए ट्रंप अपने समर्थकों को फिर से एकजुट करना चाहते हैं। उन्होंने पहले भी वेनेजुएला, ईरान और क्यूबा की सरकारों को “तानाशाही” करार देते हुए उन्हें गिराने की बात कही थी।
दूसरी ओर, जिन देशों का नाम इन अटकलों में लिया जा रहा है, उन्होंने अमेरिका पर आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अमेरिका लोकतंत्र और मानवाधिकारों के नाम पर अपने हित साधने की कोशिश करता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी यह सवाल उठता रहा है कि क्या किसी देश की सरकार को गिराने की कोशिश करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन नहीं है।
कुल मिलाकर, ट्रंप के बयान ने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि यह केवल चुनावी बयानबाज़ी है या वाकई अमेरिका किसी नए देश में सत्ता परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाने वाला है। दुनिया की नजरें आने वाले दिनों में अमेरिका की कूटनीतिक गतिविधियों और संबंधित देशों की प्रतिक्रिया पर टिकी रहेंगी।



