
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच पूर्व भारतीय राजनयिक डीपी श्रीवास्तव का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ईरान के खिलाफ किसी बड़े सैन्य अभियान की सोचता है, तो उसे वहां भी मुंह की खानी पड़ सकती है। श्रीवास्तव के अनुसार ईरान केवल सैन्य ताकत ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय रणनीति, भूगोल और अपने सहयोगियों के कारण भी काफी मजबूत स्थिति में है। उनका मानना है कि ईरान को हराना उतना आसान नहीं है जितना कुछ लोग समझते हैं।
डीपी श्रीवास्तव ने कहा कि पिछले कई दशकों में अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के कई देशों में सैन्य हस्तक्षेप किया है, लेकिन उसके परिणाम हमेशा उसके पक्ष में नहीं रहे। इराक और अफगानिस्तान के अनुभव यह बताते हैं कि किसी भी देश की आंतरिक जटिलताओं और क्षेत्रीय समीकरणों को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। ईरान के मामले में यह चुनौती और भी ज्यादा है क्योंकि वहां की राजनीतिक व्यवस्था, सैन्य संरचना और जनता का राष्ट्रवादी रुख काफी मजबूत माना जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के पास केवल पारंपरिक सैन्य शक्ति ही नहीं बल्कि मिसाइल क्षमता, ड्रोन टेक्नोलॉजी और क्षेत्र में मौजूद सहयोगी समूहों का भी बड़ा नेटवर्क है। ऐसे में यदि कोई सीधा संघर्ष होता है तो उसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट में अस्थिरता फैल सकती है। इसका असर वैश्विक तेल बाजार, व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से दुनिया की बड़ी ताकतें भी सतर्क हो गई हैं। कई देश इस संकट को कूटनीतिक तरीके से सुलझाने की अपील कर रहे हैं ताकि किसी बड़े युद्ध की स्थिति पैदा न हो। डीपी श्रीवास्तव ने भी यही सुझाव दिया कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों का समाधान सैन्य ताकत के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए ही बेहतर तरीके से निकाला जा सकता है।
कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में अगर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार शांति और संयम की अपील कर रहा है, ताकि क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे और किसी बड़े संघर्ष से दुनिया को बचाया जा सके।



