
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में 26 सितंबर 2025 को रूस और चीन द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया, जिससे ईरान पर 2015 के परमाणु समझौते के तहत “snapback” तंत्र के माध्यम से पुनः प्रतिबंध लागू हो गए। यह प्रस्ताव ईरान पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगाए गए प्रतिबंधों की वापसी को छह महीने के लिए स्थगित करने का था। हालांकि, प्रस्ताव को 15 सदस्यीय UNSC में से केवल चार देशों का समर्थन मिला, जबकि नौ देशों ने विरोध किया और दो देशों ने अनुपस्थिति दर्ज की। इस अस्वीकृति के परिणामस्वरूप, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी द्वारा शुरू किए गए “snapback” तंत्र के तहत ईरान पर पुनः प्रतिबंध लागू हो गए।
ईरान ने इन प्रतिबंधों को “अवैध” और “अन्यायपूर्ण” करार दिया है। राष्ट्रपति मसूद पेझेश्कियन ने इसे अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक गंभीर झटका बताया और कहा कि पश्चिमी देशों ने ईरान के साथ वार्ता की प्रक्रिया को कमजोर किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर नहीं जाएगा, जैसा कि उत्तर कोरिया ने किया था। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि प्रतिबंध लागू होते हैं, तो ईरान अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ अपने सहयोग को समाप्त कर सकता है।
रूस और चीन, जो UNSC के स्थायी सदस्य हैं और ईरान के प्रमुख सहयोगी भी हैं, ने इस निर्णय पर गहरी निराशा व्यक्त की है। रूस के उप-राजदूत दिमित्री पोल्यांस्की ने कहा कि यह निर्णय कूटनीतिक समाधान की दिशा में एक बड़ा कदम पीछे है और इसके लिए जिम्मेदारी उन देशों पर है जिन्होंने प्रस्ताव का विरोध किया। चीन के उप-राजदूत गेंग शुआंग ने भी इस निर्णय को खेदजनक बताया और कहा कि संवाद और वार्ता ही ईरान के परमाणु मुद्दे का एकमात्र समाधान हैं।
ईरान पर लगाए गए ये प्रतिबंध ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरगची के अनुसार, ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार, मिसाइल कार्यक्रम और हथियारों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाएंगे। इसके अतिरिक्त, ईरान की विदेश संपत्तियों को फ्रीज किया जाएगा और यात्रा प्रतिबंध भी लागू होंगे।
यह घटनाक्रम ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच बढ़ती असहमति और तनाव को दर्शाता है। जहां पश्चिमी देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम को एक गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं, वहीं रूस और चीन इसे कूटनीतिक समाधान के माध्यम से सुलझाने की वकालत कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईरान का परमाणु मुद्दा केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
अंततः, यह घटनाक्रम UNSC की कार्यप्रणाली और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की जटिलताओं को उजागर करता है, जहां एक प्रस्ताव की अस्वीकृति से वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।



