
देश की न्यायिक व्यवस्था के शीर्ष संस्थान सुप्रीम कोर्ट में उस समय सख्त संदेश देखने को मिला जब Chief Justice of India (सीजेआई) ने रजिस्ट्री के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत की प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार की मनमानी या देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने रजिस्ट्री द्वारा याचिकाओं की लिस्टिंग, दस्तावेजों की जांच और मामलों की प्रक्रिया में अनावश्यक आपत्तियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था न्यायिक कामकाज में बाधा नहीं बननी चाहिए।
सीजेआई ने यह भी रेखांकित किया कि रजिस्ट्री का काम न्यायालय की सहायता करना है, न कि पक्षकारों के लिए अतिरिक्त अड़चनें खड़ी करना। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि तकनीकी आधार पर मामलों को लंबित रखने की प्रवृत्ति पर तुरंत रोक लगाई जाए। अदालत ने दो टूक कहा कि यदि किसी याचिका में कमी है तो उसे स्पष्ट रूप से और समयबद्ध तरीके से बताया जाए, ताकि पक्षकार शीघ्र सुधार कर सकें।
इस टिप्पणी को न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि शीर्ष अदालत की यह सख्ती निचली अदालतों और अन्य न्यायिक संस्थानों के लिए भी एक संदेश है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं न्याय में देरी का कारण नहीं बननी चाहिए। सीजेआई ने दोहराया कि अदालत आम नागरिक की अंतिम उम्मीद है, इसलिए यहां कार्यप्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए।
बताया जा रहा है कि हाल के दिनों में कुछ मामलों की लिस्टिंग और दाखिले को लेकर शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए व्यवस्था दुरुस्त करने के संकेत दिए। सीजेआई की इस कड़ी टिप्पणी के बाद रजिस्ट्री में कामकाज के तौर-तरीकों की समीक्षा की संभावना भी जताई जा रही है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रियाओं को और अधिक डिजिटल, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं, ताकि न्याय तक पहुंच आसान और प्रभावी हो सके।



