
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर देश में बड़ी चर्चा है। इस समझौते का सीधा असर आम लोगों की जेब और सेहत दोनों पर पड़ सकता है। खासकर वजन घटाने की दवाएं और जान बचाने वाली जीवनरक्षक दवाएं, जो अभी तक काफी महंगी मानी जाती हैं, उनके सस्ते होने की उम्मीद जताई जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है टैरिफ यानी आयात शुल्क में कटौती या उसका पूरी तरह खत्म होना।
वर्तमान में यूरोप से भारत आने वाली कई उन्नत दवाओं पर आयात शुल्क लगता है, जिससे उनकी कीमतें बढ़ जाती हैं। इसमें डायबिटीज, कैंसर, हार्ट डिजीज और मोटापे से जुड़ी दवाएं शामिल हैं। भारत-EU ट्रेड डील के लागू होने के बाद अगर इन दवाओं पर टैरिफ घटता है या खत्म होता है, तो कंपनियों की लागत कम होगी और इसका फायदा सीधे उपभोक्ताओं को मिल सकता है।
हाल के वर्षों में वजन घटाने वाली दवाओं की मांग तेजी से बढ़ी है। मोटापा अब केवल सौंदर्य से जुड़ा मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह कई गंभीर बीमारियों की जड़ बन चुका है। यूरोप की कई फार्मा कंपनियां इस क्षेत्र में अत्याधुनिक दवाएं बनाती हैं, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण ये भारत में सीमित लोगों तक ही पहुंच पाती हैं। ट्रेड डील के बाद इनके दाम कम होने से मध्यम वर्ग और गंभीर मरीजों के लिए इलाज आसान हो सकता है।
जीवनरक्षक दवाओं की बात करें तो भारत पहले से ही दुनिया का “फार्मेसी हब” माना जाता है। इसके बावजूद कुछ खास बीमारियों के लिए यूरोप से आयातित दवाओं पर निर्भरता बनी हुई है। टैरिफ हटने से न केवल कीमतें घटेंगी, बल्कि बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। इससे भारतीय कंपनियों को बेहतर तकनीक अपनाने और गुणवत्ता सुधारने का मौका मिलेगा।
हालांकि, इस डील को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पेटेंट नियमों और डेटा प्रोटेक्शन से जुड़ी शर्तें अगर सख्त हुईं, तो जेनेरिक दवाओं के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि वह मरीजों के हितों से समझौता नहीं करेगी और संतुलित समझौता ही किया जाएगा।
कुल मिलाकर, भारत-EU ट्रेड डील अगर सही शर्तों के साथ लागू होती है, तो वजन घटाने और जान बचाने वाली दवाएं सस्ती हो सकती हैं। इससे न सिर्फ आम लोगों को राहत मिलेगी, बल्कि भारत के हेल्थकेयर सेक्टर को भी नई मजबूती मिलेगी।



