
प्रधान के इस्तीफे और CJP प्रदर्शन के खत्म होने के बाद देश की राजनीति में एक नया मोड़ आया है। लंबे समय से जारी गतिरोध के बाद अब संसद के सुचारू संचालन का रास्ता साफ होता दिखाई दे रहा है। सरकार के लिए यह राहत की स्थिति है, वहीं विपक्ष के लिए यह समय अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने का है।
संसद अब केवल बहस का मंच नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत दिखाने की जगह भी बनेगी। विपक्ष को यह साबित करना होगा कि वह केवल विरोध की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों पर प्रभावी तरीके से अपनी बात रख सकता है।
प्रधान के इस्तीफे के बाद सत्ता पक्ष पर भी दबाव रहेगा कि वह स्थिरता बनाए रखे और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाए। वहीं विपक्ष की भूमिका आने वाले दिनों में तय करेगी कि राजनीतिक माहौल टकराव की ओर जाता है या संवाद और समाधान की दिशा में बढ़ता है।
संसद की कार्यवाही शुरू होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। अब नजर इस बात पर होगी कि सरकार और विपक्ष इस मौके का इस्तेमाल किस तरह करते हैं और क्या राजनीतिक संकट के बाद सहयोग की कोई नई राह बनती है।



