
सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता विवादों के निपटारे से जुड़ी व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने उन राज्यों को सुझाव दिया है जहां उपभोक्ता मामलों की संख्या 1000 से कम है कि वे जिला उपभोक्ता फोरम की संख्या और जरूरत की समीक्षा कर सकते हैं।
कोर्ट का कहना है कि कम मामलों वाले क्षेत्रों में कई जिला फोरम का संचालन संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिहाज से प्रभावी नहीं हो सकता। ऐसे में राज्यों को उपभोक्ता मामलों की संख्या, भौगोलिक जरूरत और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखते हुए उचित फैसला लेने पर विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि उपभोक्ताओं को न्याय मिलने की प्रक्रिया प्रभावित नहीं होनी चाहिए। यदि किसी फोरम का पुनर्गठन किया जाता है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लोगों को शिकायत दर्ज कराने और सुनवाई में किसी तरह की परेशानी न हो।
उपभोक्ता अदालतें ग्राहकों को खराब उत्पाद, सेवाओं में कमी और अन्य विवादों के समाधान के लिए कानूनी मंच उपलब्ध कराती हैं। ऐसे में अदालत ने व्यवस्था को अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाने की दिशा में यह निर्देश दिया है।
अब राज्यों को अपने यहां लंबित मामलों और जिला उपभोक्ता आयोगों की कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी होगी। इसके आधार पर फोरम की संख्या को लेकर आगे निर्णय लिया जा सकता है।



