
चीन की बदलती रणनीति के बीच भारत के सामने ग्रे-जोन चुनौतियों से निपटने की जरूरत बढ़ रही है। पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने चीन की रणनीति का विश्लेषण करते हुए भारत को ऐसे दौर के लिए तैयार रहने की जरूरत बताई है, जिसमें दोनों देशों के बीच सीधे युद्ध के बजाय लगातार रणनीतिक और सैन्य दबाव बना रह सकता है।
ग्रे-जोन रणनीति का मतलब ऐसे कदमों से है जो खुले युद्ध की सीमा तक नहीं पहुंचते, लेकिन दूसरे देश पर दबाव बनाने और धीरे-धीरे मौजूदा स्थिति को बदलने का प्रयास करते हैं। इसमें सैन्य गतिविधियों के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव, सूचना अभियान और रणनीतिक बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल भी शामिल हो सकता है।
भारत-चीन सीमा पर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) की स्थिति इस चुनौती को और महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे में भारत के लिए सीमा क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, निगरानी क्षमता बढ़ाने और सैन्य तैयारियों को लगातार बेहतर करने की जरूरत होगी।
‘आर्म्ड को-एग्जिस्टेंस’ का आशय ऐसी स्थिति से है जिसमें दोनों देश खुले संघर्ष से बचते हुए भी मजबूत सैन्य क्षमता और निरंतर सतर्कता बनाए रखें। गोखले के विश्लेषण के अनुसार भारत को चीन के साथ संबंधों में संवाद और कूटनीति के साथ-साथ रणनीतिक सावधानी भी बनाए रखनी होगी।
चीन की रणनीति को समझना भारत के लिए इसलिए भी जरूरी है क्योंकि केवल पारंपरिक सैन्य खतरे पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं हो सकता। सीमा पर छोटे-छोटे बदलाव, दबाव की रणनीति और गैर-पारंपरिक तरीकों से पैदा होने वाली चुनौतियों का समय रहते आकलन करना महत्वपूर्ण होगा।
भारत को अपनी रक्षा तैयारियों के साथ कूटनीतिक क्षमता और आर्थिक मजबूती पर भी ध्यान देना होगा। मजबूत प्रतिरोधक क्षमता के साथ प्रभावी संवाद बनाए रखना दोनों देशों के बीच तनाव को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
ऐसे समय में भारत-चीन संबंधों का भविष्य केवल सीमा विवाद से तय नहीं होगा, बल्कि दोनों देशों की सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक रणनीतियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी। चीन की ग्रे-जोन गतिविधियों के बीच भारत के लिए सतर्कता, तैयारी और रणनीतिक स्पष्टता सबसे अहम आवश्यकता बनती जा रही है।



