
मुंबई में आज भारत और फ्रांस के रिश्तों को नई ऊंचाई देने वाली अहम मुलाकात होने जा रही है। प्रधानमंत्री Narendra Modi और फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron के बीच होने वाली इस बैठक पर पूरी दुनिया की नजर है। माना जा रहा है कि इस दौरान बहुप्रतीक्षित राफेल डील पर अंतिम मुहर लग सकती है, जिससे भारत की वायु और नौसैनिक ताकत को बड़ा बल मिलेगा। बदलते वैश्विक समीकरणों और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बने हालात में भारत अपने रक्षा सहयोग को विविध और संतुलित बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में फ्रांस एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में उभरकर सामने आया है।
भारत पहले से ही फ्रांस से 36 Dassault Rafale लड़ाकू विमान खरीद चुका है, जो भारतीय वायुसेना की ताकत में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अब चर्चा है कि नौसेना के लिए राफेल-एम संस्करण और अतिरिक्त विमानों की खरीद पर सहमति बन सकती है। यह सौदा केवल रक्षा उपकरणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तकनीकी हस्तांतरण, संयुक्त उत्पादन और ‘मेक इन इंडिया’ पहल को भी मजबूती देगा। भारत की रणनीति साफ है—वह किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय बहु-आयामी रक्षा साझेदारी चाहता है।
रूस लंबे समय तक भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। फ्रांस ने हमेशा भारत की सामरिक स्वायत्तता का सम्मान किया है और संयुक्त राष्ट्र समेत कई वैश्विक मंचों पर उसका समर्थन किया है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत-फ्रांस सहयोग समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष तकनीक तक विस्तारित हो रहा है।
मुंबई में होने वाली यह बैठक केवल एक रक्षा समझौते तक सीमित नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी के नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राफेल डील पर मुहर लगती है तो यह संदेश जाएगा कि भारत और फ्रांस के संबंध अब पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़कर दीर्घकालिक रणनीतिक गठजोड़ की दिशा में बढ़ रहे हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में फ्रांस, भारत के लिए एक नए और भरोसेमंद ‘रणनीतिक रूस’ की भूमिका निभा सकता है।



