ईरान संघर्ष बढ़ा तो भारत पर पड़ेगा असर: महंगाई, बेरोजगारी और तेल संकट के 4 बड़े खतरे

मध्य पूर्व में ईरान से जुड़ा संघर्ष यदि जल्द नहीं थमता है तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है और कच्चे तेल का अधिकांश हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। ऐसे में अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या आपूर्ति बाधित होती है तो सबसे पहला झटका तेल की कीमतों में भारी उछाल के रूप में दिखाई देगा। कच्चे तेल के महंगा होने से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जिससे परिवहन लागत बढ़ेगी और इसका असर हर रोज इस्तेमाल होने वाली चीजों की कीमतों पर भी पड़ेगा। यानी महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। दूसरा बड़ा झटका गैस सप्लाई और ऊर्जा लागत से जुड़ा हो सकता है। भारत एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का भी बड़ा आयातक है और मध्य पूर्व इस आपूर्ति का अहम स्रोत है। अगर वहां संघर्ष तेज होता है तो गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे बिजली उत्पादन और उद्योगों की लागत भी बढ़ जाएगी। तीसरा असर रोजगार और उद्योगों पर पड़ सकता है। ऊर्जा महंगी होने से मैन्युफैक्चरिंग और ट्रांसपोर्ट सेक्टर की लागत बढ़ेगी, जिससे कंपनियां उत्पादन घटा सकती हैं या नई भर्ती टाल सकती हैं। इससे बेरोजगारी का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। चौथा बड़ा झटका विदेशी व्यापार और चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। यदि रुपया कमजोर होता है तो आयातित वस्तुएं और महंगी हो जाती हैं, जो महंगाई को और बढ़ाती हैं। इसके अलावा खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाली रेमिटेंस पर भी अनिश्चितता का असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर अगर ईरान से जुड़ा यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो भारत को महंगाई, ऊर्जा संकट, रोजगार दबाव और आर्थिक अस्थिरता जैसे कई मोर्चों पर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए वैश्विक बाजारों और कूटनीतिक प्रयासों पर भारत की नजर बनी हुई है, ताकि संभावित जोखिमों को कम किया जा सके।



