संयुक्त राष्ट्र महासभा की हालिया बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका और चीन के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिला। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार कर दी। अमेरिका ने चीन पर यह आरोप लगाया कि वह रूस की आक्रामकता को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन दे रहा है, जिससे यूक्रेन में युद्ध और अधिक लंबा खिंच रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधि ने कहा कि “जो देश शांति की बात करते हैं, वही पर्दे के पीछे आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।” जवाब में चीन ने अमेरिका पर पलटवार करते हुए कहा कि अमेरिका खुद वैश्विक शांति में सबसे बड़ा विघ्न है, जिसने कई देशों में हस्तक्षेप करके अस्थिरता पैदा की है। चीन ने यह भी कहा कि अमेरिका को “दोहरे मापदंड” छोड़कर वास्तव में एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति की भूमिका निभानी चाहिए। इस तीखी बहस के दौरान कई अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने भी चिंता जताई कि यदि दो प्रमुख वैश्विक शक्तियां आपस में ही भिड़ती रहीं, तो रूस-यूक्रेन संघर्ष का समाधान कभी नहीं निकलेगा। इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय बंटा हुआ नजर आया—कुछ देश अमेरिका के साथ खड़े दिखे तो कुछ ने चीन की “शांति वार्ता की पहल” का समर्थन किया। इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि रूस-यूक्रेन युद्ध अब सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा बन चुकी है, जिसमें बड़े देश अपनी-अपनी रणनीति के तहत भागीदारी निभा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र कोई ठोस समाधान निकाल पाएगा या यह मंच भी केवल आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बनकर रह जाएगा।
रूस-यूक्रेन युद्ध अब दो साल से अधिक समय से जारी है और इसकी वजह से न केवल यूरोप बल्कि पूरी दुनिया पर भू-राजनीतिक प्रभाव पड़ा है। अमेरिका लगातार रूस की आलोचना करता आया है और यूक्रेन को सैन्य व आर्थिक सहायता देता रहा है। वहीं, चीन ने खुद को “तटस्थ मध्यस्थ” के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन उसके रूस के साथ बढ़ते व्यापार और कूटनीतिक संबंधों ने पश्चिमी देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। संयुक्त राष्ट्र में हुई इस बहस में यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका और चीन के दृष्टिकोण में न केवल अंतर है, बल्कि दोनों देश इस युद्ध के संदर्भ में एक-दूसरे को सीधे तौर पर ज़िम्मेदार ठहराने लगे हैं।
चीन के प्रतिनिधि ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका हथियारों की आपूर्ति कर युद्ध को लम्बा खींच रहा है और अपने सामरिक हितों को साधने के लिए यूक्रेन संकट का उपयोग कर रहा है। उन्होंने अमेरिका पर यह भी आरोप लगाया कि वह मानवाधिकार और शांति की बातें केवल दिखावे के लिए करता है, जबकि असलियत में उसकी नीतियाँ सिर्फ ‘ताकत की राजनीति’ पर आधारित हैं। चीन ने अपने “12 सूत्रीय शांति प्रस्ताव” का भी जिक्र किया और कहा कि सिर्फ सैन्य समाधान से नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति से ही यह युद्ध समाप्त हो सकता है।
अमेरिका ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि चीन अगर वाकई शांति चाहता है तो उसे स्पष्ट रूप से रूस की निंदा करनी चाहिए और उस पर दबाव बनाना चाहिए कि वह अपनी सेना यूक्रेन से वापस बुलाए। अमेरिका ने यह भी चेतावनी दी कि यदि चीन रूस को हथियार या तकनीकी सहायता देता है, तो यह वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा होगा। इस बयान से दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया और बहस का स्वरूप आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया।



