यूपी में बजट खर्च और राजस्व वसूली पर सवाल, क्यों धरातल पर नहीं उतर रहीं योजनाएं?

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में हर साल बड़ा बजट पेश किया जाता है, विकास के दावे किए जाते हैं और नई-नई योजनाओं की घोषणाएं भी होती हैं। कागजों पर आंकड़े प्रभावशाली नजर आते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार अलग तस्वीर दिखाती है। कई विभागों में आवंटित धनराशि समय पर खर्च नहीं हो पाती, जबकि दूसरी ओर राजस्व संग्रह भी तय लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाता। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर दिक्कत कहां आ रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बजट का पूरा उपयोग न होने के पीछे सबसे बड़ी वजह प्रक्रियागत देरी, टेंडर की जटिलता, और विभागों के बीच तालमेल की कमी है। कई परियोजनाएं फाइलों में घूमती रहती हैं और वित्तीय वर्ष खत्म होने के करीब आकर जल्दबाजी में खर्च दिखाने की कोशिश होती है। इसका असर गुणवत्ता पर भी पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, पेयजल और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं के अधूरे रहने की शिकायतें अक्सर सामने आती रहती हैं।
राजस्व की बात करें तो टैक्स वसूली, संपत्ति पंजीकरण, खनन और परिवहन जैसे क्षेत्रों से बड़ी आय की उम्मीद रहती है। लेकिन लक्ष्य और उपलब्धि के बीच का अंतर बताता है कि या तो अनुमान ज्यादा ऊंचे रखे जाते हैं या फिर संग्रह तंत्र उतना प्रभावी नहीं है जितना होना चाहिए। डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर निगरानी और जवाबदेही को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि यदि सरकार को योजनाओं का वास्तविक लाभ लोगों तक पहुंचाना है तो केवल बजट बढ़ाना काफी नहीं होगा। परियोजनाओं की समयबद्ध मॉनिटरिंग, अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना और पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है। साथ ही, जिन विभागों का प्रदर्शन बेहतर है, उनके मॉडल को अन्य जगहों पर भी लागू किया जा सकता है।
जनता के नजरिए से देखें तो उन्हें घोषणाओं से ज्यादा काम का असर चाहिए। जब अस्पताल में सुविधा मिले, सड़क समय पर बने, रोजगार के अवसर बढ़ें—तभी बजट का महत्व समझ में आता है। इसलिए आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि आवंटित धनराशि कागजों से निकलकर जमीन पर दिखे।



