
Supreme Court of India ने एक अहम फैसले में कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत सार्वजनिक अवकाश की मांग को शामिल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी विशेष धर्म के आधार पर सार्वजनिक छुट्टी अनिवार्य रूप से दी जाए।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सार्वजनिक अवकाश का निर्धारण प्रशासनिक और नीतिगत विषय है, जिसे सरकार परिस्थितियों और व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर तय करती है। इसलिए इसे मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं रखा जा सकता।
इस निर्णय को कानून और शासन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक अधिकारों और प्रशासनिक फैसलों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल के तौर पर काम करेगा।



